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ब्लॉग

हैप्पी दिवाली, पड़ोसी जाएं भाड़ में

मोबाइल पर लगातार दीपावली की शुभकामनाएं आ जा रही हैं. लेकिन इन शुभकामनाओं के बाद रात में बहुत ही तेज आवाज वाले बम फोड़े जाएंगे. लोग परेशान होंगे लेकिन बम फोड़ने वालों को इससे फर्क थोड़े ही पड़ता है.

दीपावली यानि श्रावण अमावस्या की रात. कहानियों के मुताबिक इसी दिन राम वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे. अंधकार हटाने के लिए प्रजा ने दीप जलाए. और दीवाली की शुरुआत हुई. आज घरों में जगमग बिजली की रोशनी है. लेकिन फिर भी सांकेतिक रूप से जलते दीपक दिवाली का संदेश देते हैं. माहौल में गर्माहट भरते हैं. परिवार करीब आता है और खुशी का अहसास होता है.

और इस खुशनुमा अहसास के बाद झल्लाहट शुरू होती है. रात 10 बजे तक मुर्गा छाप जैसे पटाखों से लोगों को कोई समस्या नहीं होती. लेकिन रस्सी में लिपटे हुए हथगोले जैसे दिखते बमों से परेशानी होती है. लेकिन इसके बावजूद करीब करीब हर जगह कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो बहुत ही ज्यादा आवाज करने वाले बम फोड़ते हैं. कभी कभार तो सुतली में आग लगाकर बम दूसरों की तरफ फेंक दिये जाते हैं.

रात में 10 बजे, 11 बजे, 12 बजे या फिर एक बजे तक धमाके होते हैं. धमाकों की बहरा कर देने वाली तेज आवाज बच्चों और बुजुर्गों को बहुत परेशान करती है. सहमे बच्चे मां बाप से लिपट जाते हैं और बुजुर्ग करवटें बदलते रहते हैं. लेकिन दूसरे की परवाह किसे है, क्योंकि शुभकामनाएं तो पहले ही दी जा चुकी हैं.

दीवाली की रात सरकारी अस्पतालों की इमरजेंसी में बम पटाखों की दुर्घटनाओं के कई मामले आते हैं. इंसान के कान 50 से 65 डेसीबल की आवाज को बड़े अच्छे से सुनते हैं. लेकिन कई बमों की आवाज 160 डेसीबल से भी ज्यादा होती है और कान के पर्दों को नुकसान पहुंचाती है. शोर के अलावा वायु प्रदूषण भी बड़ी समस्या है. दिल्ली में ही पिछले साल दीवाली के मौके पर हवा में जहरीले तत्व सुरक्षित सीमा से करीब आठ गुना ज्यादा थे. इस साल भी यही स्थिति बन चुकी है. देश में हर साल वैसे ही 12 लाख लोग दूषित हवा की वजह से मारे जा रहे हैं. किसी को दमा हो रहा है तो किसी को लंग कैंसर और दिल की बीमारियां.

लेकिन इसके बावजूद एक समाज के रूप में अब तक ये आम राय नहीं बन सकी है कि दीपों के पर्व को रोशनी से ही जगमग किया जाए और पटाखे अगर फोड़े भी जांए तो इस तरह कि स्वास्थ्य को नुकसान न पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने जब दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर बैन लगाया तो सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने ऐसी भड़ास निकाली जैसे कोर्ट ने भारी गुस्ताखी कर दी हो. वे भूल गए त्योहार जीवन में पीड़ा नहीं भरते, बल्कि एक समाज के रूप में सबको आनंदित करने के लिए मनाये जाते हैं.

(दिवाली मनाते शहर)

 

 

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