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दुनिया

हीरो को याद करता चिंतित जापान

इसोफागीयल कैंसर से जूझ रहे फुकुशिमा परमाणु संयत्र के प्रमुख की मौत हो गई. दो साल पहले हुए हादसे के बाद इसी अधिकारी ने जान जोखिम में डालकर संयंत्र को सुरक्षित करने का बीड़ा उठाया था.

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मासाओ योशिदा

58 साल के मासाओ योशिदा ने मंगलवार को टोक्यो के अस्पताल में आखिरी सांस ली. संयंत्र चलाने वाली बिजली कंपनी, टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (टेप्को) के मुताबिक योशिदा संयंत्र हादसे की वजह से बीमार नहीं थे.

जापान में 11 मार्च 2011 को शक्तिशाली भूकंप के बाद प्रशांत महासागर में सूनामी लहरें उठीं. फुकुशिमा दाइची परमाणु बिजलीघर इस आपदा को नहीं झेल सका. भूकंप और सूनामी के अगले दिन 12 मार्च को रिएक्टर की यूनिट वन में धमाका हुआ. फिर दो और रिएक्टर पिघलने लगे. हादसे के वक्त योशिदा प्लांट के इनचार्ज थे. धमाके के बाद योशिदा ने रिएक्टरों को ठंडा करने के लिए उनमें समुद्री पानी उड़ेलना शुरू कर दिया. कंपनी मुख्यालय से योशिदा को आदेश मिला कि वह ऐसा न करें, लेकिन योशिदा ने इसे नहीं माना. शुरू में उन्हें कंपनी ने अनुशासनहीन कहा लेकिन सच्चाई का पता चलने पर योशिदा की तारीफ की. टेप्को को बाद में पता चला कि अगर योशिदा ने पानी डालना बंद कर दिया होता तो हालात और बुरे होते. हादसे की जांच करने वाले आयोग के पूर्व सदस्य कुनियो यानागिडा ने योशिदा के निधन को भारी नुकसान कहा है. टेपको की तमाम आलोचना के बावजूद योशिदा अकेले ऐसे अधिकारी थे, जिन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नाओतो कान को भी भरोसा था.

हादसे के दौरान योशिदा खुद रिएक्टरों के करीब गए. उस दौरान एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "ऐसे भी मौके आए जब मुझे लगा कि हम सब यहीं मारे जाएंगे. मुझे इस बात का डर सताने लगा कि प्लांट नियंत्रण से बाहर हो रहा है और हम सब खत्म हो जाएंगे."

हादसे के नौ महीने बाद दिसंबर 2011 में योशिदा ने खराब सेहत का हवाला देते हुए प्लांट चीफ के पद से इस्तीफा दे दिया. योशिदा को उम्मीद थी कि तबीयत ठीक होने पर वह दोबारा अपने पद पर लौटेंगे. टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से न्यूक्लीयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके योशिदा ने 1979 में टेप्को में नौकरी शुरू की. फुकुशिमा दाइची का प्रमुख बनने से पहले वह परमाणु विभाग में काम कर रहे थे.

Fukushima Daiichi Atomkraftwerk

हादसे के वक्त फुकुशिमा संयंत्र

परमाणु ऊर्जा से चिंता

योशिदा के निधन के बाद जापान में एक बार फिर परमाणु बिजली घरों पर बहस शुरू हो गई है. 1986 में चेरनोबिल परमाणु प्लांट में हुए हादसे के बाद फुकुशिमा को दूसरा बड़ा परमाणु हादसा कहा जाने लगा है. कई लोग मान रहे हैं कि योशिदा को कैंसर विकिरण की वजह से हुआ. फुकुशिमा के पानी में अब भी भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव तत्व मिल रहे हैं.

फुकुशिमा हादसे के बाद जापान ने अपने ज्यादातर परमाणु बिजलीघर बंद कर दिए. फिलहाल जापान के 50 रिएक्टरों में से सिर्फ दो ही बिजली सप्लाई करने वाले ग्रिड से जुड़े हैं. सोमवार को कंपनियों ने 10 और रिएक्टरों को चालू करने की अनुमति मांगी है. परमाणु बिजलीघर बंद करने की मार जापान की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रही है. दूसरे देशों से तेल आयात करने की वजह से बेतहाशा खर्च हो रहा है.

सोमवार को ही नियामक संस्था से नए नियम लागू किए हैं. न्यूक्लीयर रेगुलेशन अथॉरिटी के कमिश्नर केन्जो ओशिमा का कहना है कि, "कुछ यूनिटें अभी से एक साल बाद चालू होने के लिए तैयार हैं, कितनी, यह मैं फिलहाल नहीं जानता."

ओएसजे/एनआर(एपी, रॉयटर्स)

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