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मनोरंजन

हिन्दी से हो रहा है प्रतिभा पलायन

पंकज बिष्ट सरकारी नौकरी छोड़कर हिन्दी में पत्रिका निकाल रहे हैं. उनका कहना है कि हिन्दी में भी विश्वस्तरीय लेखन संभव है, लेकिन इस समय प्रतिभाएं हिन्दी में नहीं आ रहीं, बल्कि उनका पलायन हो रहा है.

पंकज बिष्ट हिन्दी के जाने-माने कथाकार और संपादक हैं. उनका पहला कहानी संग्रह 'अंधेरे से' असगर वजाहत के साथ 1976 में संयुक्त रूप से छपा था. इसके बाद उनके छह कहानी संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित हुए हैं जिनमें से कई का अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में और 'लेकिन दरवाजा' का इटैलियन में अनुवाद भी हुआ है. 1999 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद से वे 'समयान्तर' पत्रिका का संपादन कर रहे हैं. प्रस्तुत है उनके साथ हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:

आप साहित्यिक लेखन की और कैसे प्रवृत्त हुए? सुना है कि आपके पिताजी पढ़ने के साथ-साथ लिखने के भी शौक़ीन थे और उन्हीं से आपने प्रेरणा ली?

निश्चय ही मेरे पिताजी को पढ़ने लिखने का बेहद शौक था. यह मेरे लिए प्रेरणा का कारण बना और एक मायने में मार्गदर्शक भी. पर मेरे लेखक बनने में मेरी मां की, जो पिताजी की तुलना में बहुत ही कम पढ़ी-लिखी थीं, बड़ी भारी भूमिका रही. बचपन में वही मुझे विभिन्न किस्म की कहानियां सुनाया करती थीं. अपने परिवार, आसपास के लोगों और अपने अनुभवों को वह जिस तरह से सुनाती थीं, वह उन घटनाओं और चरित्रों को सहज ही कथात्मक आयाम प्रदान कर देता था. 'महाभारत' को तो मैंने मां के कारण बचपन में ही जान लिया था. उसके चरित्रों और कथाओं की भी उनकी अपनी ही व्याख्या होती थी. उनमें  रचनात्मकता और कल्पनाशीलता का अद्भुत मिश्रण था. सच यह है कि कल्पना जगत का रास्ता मुझे मेरी मां ने ही दिखलाया.

आपकी कहानियां और उपन्यास तो मशहूर हैं ही. क्या कभी कविता भी लिखी? राजेंद्र यादव जैसे बड़े कहानीकार कविता के विरोधी माने जाते थे. आपकी राय में साहित्य में क्या ऐसी हदबंदी की जा सकती है?

मैंने कविताएं भी लिखी हैं, उसी तरह जिस तरह एक फुटबाल खिलाड़ी कभी-कभी बिलियर्ड खेलता है. सारी कलाएं अपने मूल में अलग नहीं हैं. न उनमें कोई विरोधाभास या टकराव है. अक्सर अच्छा गद्य काव्यात्मक हो जाता है. कहां कविता में गद्य या कथात्मकता के गुण शामिल हो जाएं और कहां गद्य में कविता मिल जाए, कहना मुश्किल है. पर ये जहां मिलते हैं वहां रचनात्मकता को प्रखर ही करते हैं.

आपने सरकारी सेवा से स्वेच्छापूर्वक अवकाश ग्रहण किया और 'समयांतर' का संपादन-प्रकाशन शुरू किया. इस पत्रिका की एक विशेषता यह भी है कि इसमें साहित्यिक विषयों के अलावा समाजविज्ञान और समकालीन राजनीति के ज्वलंत प्रश्नों पर भी पठनीय सामग्री रहती है. हिंदी में इन विषयों पर मौलिक लेखन की क्या स्थिति है?

मैं मानता हूं कि जब तक ज्ञान-विज्ञान अपनी भाषा में नहीं होगा, इसका लाभ जनता को नहीं मिलेगा और न ही ऐसा समाज ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में अपना कोई बड़ा योगदान कर पाएगा. इसलिए जरूरी है कि ज्ञान के सभी अनुशासनों में अपनी भाषाओं में लेखन होना चाहिए. हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है पर दुर्भाग्य से उसमें समाज विज्ञान, मसलन इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में लेखन नहीं के बराबर है. मेरी बेचैनी का कारण यह है कि इसको लेकर कहीं कोई प्रयत्न या चिंता भी नजर नहीं आती.

इस स्थिति को लेकर दो तरह के मिथक हैं जो मुझे सायास फैलाए गए लगते रहे हैं. पहला तो यह कि ज्ञान के उच्चस्तरीय लेखन को हिंदी में या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में नहीं लिखा जा सकता. दूसरा, हिंदी में ऐसा पाठक ही नहीं है जो गंभीर वैचारिक लेखों को पढ़ व समझ सके. पर ये दोनों ही बातें पूरी तरह गलत हैं. इसके अलावा एक रचनात्मक लेखक के रूप में भी मेरा मानना रहा है कि सामाजिक परिवर्तनों को समझे और अद्यतन ज्ञान से जुड़े बिना अच्छा लेखन हो ही नहीं सकता है. अगर उपयुक्त मंच मिले तो हिंदी में सभी विषयों में विश्वस्तर का लेखन हो सकता है. अब तक 'समयांतर' में प्रकाशित चार लेख समाज विज्ञान की सुप्रसिद्ध पत्रिका 'इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली' में प्रकाशित हो चुके हैं.

आज हिंदी का कथासाहित्य जहां खड़ा है, वहां से आगे की राह आपको कैसी दिखती है

कथा साहित्य हो या कविता, हिन्दी में लेखन की स्थिति को हिंदी की सामान्य स्थिति के संदर्भ में देखना होगा. हिंदी में प्रतिभाएं नहीं आ रही हैं बल्कि उनका पलायन हो रहा है. अधिक से अधिक लेखन अंग्रेजी में है. लोगों का झुकाव भी उधर ही है.  इसने लेखन को प्रभावित किया है. फिर कथा साहित्य के लिए मंच भी सिकुड़ रहा है. टेलीविजन ने भी कथा साहित्य को प्रभावित किया है. हिंदी में साहित्य के पाठक का निर्माण ही नहीं हो पाया.

पिछली सदी के प्रारंभ से ही दुनिया में उपन्यास साहित्य की महत्वपूर्ण विधा रहा है. आजादी के बाद के कुछ दशकों तक हिंदी में कई बड़े उपन्यासकार थे और उत्कृष्ट कृतियां सामने आई थीं. पर पिछले पांच दशक में आप देख सकते हैं मुश्किल से गिनती के उपन्यास ऐसे हैं जिन्हें आप याद कर सकते हैं. इस दौर में हमारे यहां कहानी का बोलबाला रहा है. रचनात्मकता और कल्पनाशीलता की कमी को आप आयातित आंदोलनों और शैलियों से छिपा नहीं सकते फिर चाहे वह मैजिकल रियलिज्म हो या फिर पोस्ट मॉडर्निज्म.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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