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मनोरंजन

'हिन्दी साहित्य में जबरदस्त खेमाबंदी'

असगर वजाहत हिन्दी के जाने-माने रचनाकार हैं. अपनी रचनाओं से वे जनमानस को झकझोरने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन हिन्दी साहित्य के परिवेश से वे संतुष्ट नहीं.

असगर वजाहत ने कहानियां, उपन्यास, नाटक और यात्रा वृत्तांत तो लिखे ही, दस्तावेजी फिल्में भी बनाईं और फिल्मों के लिए लेखन भी किया. मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन' की कथा के विकास में सहायता करने के बाद उनकी अगली फिल्म ‘आगमन' के लिए उन्होंने संवाद लिखे. अब तक उनकी बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें पांच कहानी संग्रह, पांच उपन्यास, छह नाटक, एक यात्रा वृत्तान्त और एक साहित्यिक आलोचना की पुस्तक शामिल है. उनके उपन्यास ‘कैसी आग लगाई' को कथा (यूके) के सर्वोत्तम उपन्यास पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. चार दशकों से अधिक समय तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में पढ़ाने और वहां प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहने के बाद अब वह रिटायर हो गए हैं और पूरा समय लेखन में लगा रहे हैं. उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश:

आपने कहानी, उपन्यास, नाटक और यात्रा वृत्तांतों के अलावा फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी है. शुद्ध साहित्य सृजन के मुकाबले यह अनुभव कैसा रहा? क्या इन दिनों भी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं?

फिल्म और नाटक लिखना एक अलग अनुभव है. कहानी, कविता और उपन्यास वगैरह व्यक्तिप्रधान माध्यम हैं, जबकि फिल्म और नाटक समूहप्रधान कलाभिव्यक्ति है. दोनों की रचना प्रक्रिया में बहुत अंतर है. चुनौतियां अलग किस्म की होती हैं. इन दिनों राजकुमार संतोषी के लिए एक फिल्म लिख रहा हूं.

आपके कई नाटक बहुत चर्चित हुए जिनमें 'इन्ना की आवाज' और 'जिसने लाहौर नहीं देख्या, वो जन्म्या ही नईं' काफी मशहूर हुए. हिन्दी में अक्सर अच्छे नाटकों की कमी की शिकायत की जाती है. ऐसा क्यों?

अच्छे नाटक इसलिए नहीं हैं क्योंकि हिन्दी में अच्छा रंगकर्म नहीं है, अच्छी रंगमंडलियां नहीं हैं. सब कुछ सरकार या संस्थाओं पर आश्रित हैं और उनकी अपनी प्राथमिकताएं हैं. ऐसे माहौल में कोई नाटक लिखे तो क्यों? मेरे बहुत-से नाटक आज तक हिन्दी में मंचित नहीं हो पाए हैं. वैसे भी मेरे नाटक हिन्दी से पहले गुजराती, कन्नड़ और अन्य दूसरी भारतीय भाषाओं में मंचित हो जाते हैं. काश! मैं कन्नड़ या गुजराती का लेखक होता.

आपने एक नाटक गांधी और गोडसे पर भी लिखा था ---गांधी@गोडसे.कॉम लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कैसा महसूस कर रहे हैं? खासकर यू आर अनंतमूर्ति के साथ हो रहे व्यवहार को देखकर....

आपका सवाल बहुत रोचक है. यह नाटक संवाद पर बल देता है, सांप्रदायिकता का विरोध पर्याप्त नहीं है, उससे कुछ निकलता नहीं. यदि हम ‘दृश्य संवाद' नहीं करेंगे तो भी ‘अदृश्य संवाद' तो होता ही रहेगा. इसलिए नाटक में गांधी गोडसे से संवाद करते हैं. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आ जाने के बाद संवाद की प्रक्रिया तेज हो सकती है. ध्यान दें कि अधिकांश राजनीतिक दल संवाद में विश्वास नहीं करते, इसलिए संवाद और कठिन हो जाता है.

अनंतमूर्तिजी के साथ जो हो रहा है, वह निंदनीय है. यह अभद्रता है जिसका विरोध होना चाहिए क्योंकि उसके साथ संवाद नहीं हो सकता.

क्या आज रचनाकार के सामने कुछ अलग किस्म की चुनौतियां हैं, बीस पच्चीस साल पहले के मुकाबले? हिन्दी साहित्य के समकालीन परिदृश्य से क्या आप संतुष्ट हैं? इस समय कौन सी विधा पिछड़ी हुई लग रही है?

आज हिन्दी का परिदृश्य बिलकुल नया और अलग है, बल्कि बहुत व्यापक होने के कारण गुब्बारे की तरह फट गया है. आज हिन्दी के रचनाकारों के लिए कम से कम आधे करोड़ रुपये के पुरस्कार हैं. इतने और ऐसे धनवान प्रकाशक हिन्दी में कभी नहीं थे. खरबों का व्यापार ईमानदारी से हो रहा होगा, यह मानना मुश्किल है. हिन्दी साहित्य में जबरदस्त खेमाबंदी है, और जबरदस्त भाई-भतीजावाद, अवसरवाद और जोड़तोड़ है. विमर्शों की घटिया राजनीति है. काले-सफेद का पता नहीं चलता. चंद लोगों को छोड़ दें तो पढ़ने का काम सबने छोड़ रखा है. आलोचना का हाल बेहाल है. ऐसे माहौल में अच्छे साहित्य की पहचान और उसका मूल्यांकन करना लगभग असंभव हो गया है. इसलिए लेखक के सामने चुनौतियां दूसरी हो गई हैं. अधिकतर लेखकों के लिए आज अच्छा लिखना चुनौती नहीं है, बल्कि अच्छे संपर्क बनाना, प्रभावशाली व्यक्तियों या गुटों से जुड़ना चुनौती है. संस्थाएं बंदरबांट कर रही हैं. पत्रिकाएं और प्रकाशक अपने-अपने गुटों के प्रचार में जुटे हैं. हिन्दी लेखकों के चित्र फिल्मी नायकों की तरह छप रहे हैं.

ऐसे परिदृश्य में संतुष्ट होने वाली कोई बात नहीं है. यहां तो काम करना ही मुश्किल है, अपने पैरों पर खड़े रह पाना ही कठिन है. सच बोलना भी मुश्किल है क्योंकि ‘चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले'. अब ऐसे में विधाओं को कौन पूछता है, किताबों को कौन पूछता है? आज सबसे बड़ी विधा वही है जिसमें लिखने वालों का तगड़ा गिरोह हो.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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