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ब्लॉग

हिन्दी का डोमेन हुआ भला नहीं

करीब 25 करोड़ की इंटरनेट आबादी वाले भारत में वेब-क्रांति का नया चरण हैः देसी डोमेन का आगाज. लेकिन डॉट भारत डोमेन से क्या हिन्दी समेत भारतीय भाषाओं का इंटरनेट पर बोलबाला हो पाएगा? उम्मीद तो है लेकिन कुछ सवाल भी हैं.

हिन्दी प्रेमियों को वेब की वर्चुअल दुनिया से एक नई खुशी हासिल होगी. डिजीटल इंडिया का भारतीय सरकारों का नारा साकार होने की दिशा में इसे बड़ा कदम तो कहा ही जा सकता है. नेशनल इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (निक्सी) और सेंटर फॉर डेवलेपमेंट ऑफ एडवान्स्ड कम्पयूटिंग(सी-डैक) पिछले दो साल से डॉट भारत डोमेन पर काम कर रहे हैं. इसकी शुरुआत वैसे 2009 में ही कर दी गई थी. इसकी वजह इंटरनेट के अंतरराष्ट्रीय संचालन का काम देख रही संस्था इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर एसाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स(आईसैन) का एक फैसला था. आईसैन वेब पतों के लिए सिर्फ लातिन कैरेक्टरों का इस्तेमाल बंद करना चाहता है.

भारत के गैर-अंग्रेजी भाषी लोग आइंदा अपनी भाषाओं में यूआरएल टाइप कर सकते हैं, गांवों देहातों और दूरदराज के इलाकों के इंटरनेट यूजर्स को इससे मदद मिलेगी. अपनी भाषा में कंटेंट को इंटरनेट पर डालने की दिलचस्पी बढ़ेगी. समाज का डिजीटल विभाजन भी टूट सकता है. अधिकारी तो कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं. डॉट भारत डोमेन देवनागरी में शुरू करने के बाद बंगाली, तमिल, तेलुगू, गुजराती, पंजाबी और उर्दू में यूआरएल बनाए जाएंगे. हिन्दी के अलावा मराठी, कोंकणी, मैथिली, डोगरी, बोडो आदि स्क्रिप्ट्स में काम करने वालों को भी मदद मिलेगी.

एक लिहाज से डिजीटल डिवाइड इस मुहिम से दूर तो होगा कि लोगों को अंग्रेजी की ही शरण में नहीं रहना होगा. लेकिन अपनी भाषाओं में यूआरएल टाइप कर लेने भर से क्या हम मान लें कि ये विभाजन नहीं रहा? हां, बेशक एक इमोश्नल जुड़ाव तो बनेगा, एक ऐसी जगह पर अपनी भाषा में लिख पाने की अनुभूति ही अलग होगी जो लंबे समय से कमोबेश वर्जित ही थी. लेकिन ये बस कुछ देर का गुमान होगा. उसके बाद आखिर जब बात आएगी कंटेंट की तो क्या वो कंटेंट हमें अपनी भाषा में उसी गति, उसी आकार और उसी गुणवत्ता का मिल पाएगा जो अभी अंग्रेजी में बेशुमार उपलब्ध है. क्या दिन रात देशदेश गाने वाले चुपचाप आएंगे और अपनी भाषाओं में सार्थक कंटेंट टाइप कर नेट पर उसे लोड कर अपना योगदान करेंगे या सोशल नेटवर्किग की “शूरवीरता” में ही खप जाएंगे?

एक आकलन के मुताबिक भारत में हर महीने 50 लाख इंटरनेट यूजर बन जाते हैं. इस तरह 2018 तक 50 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे होंगे. हिन्दी डोमेन की सफलता के सामने इंटरनेट की पहुंच, उपलब्धता और देश में साक्षरता की दर के सवाल भी हैं. भले ही इंटरनेट के इस्तेमाल में अमेरिका को पछाड़ कर भारत जल्द ही चीन के बाद दूसरे नंबर पर आ जाएगा लेकिन ये भी ध्यान रहे कि ऑनलाइन इस्तेमाल अलग चीज है और इंटरनेट की पहुंच अलग चीज. आंकड़े हैं कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में इंटरनेट पेनिट्रेशन में 17.4 फीसदी की वृद्धि दर के साथ भारत सबसे पिछड़ा हुआ है. अब एक ढंग से देखें तो सरकार का ये प्रयास इस पिछड़ेपन को दूर कर सकता है. अपनी भाषा में डोमेन लोगों को आकर्षित कर सकता है. लेकिन इसमें फिर एक संदेह तो बनता ही है कि क्या लोग वाकई अपनी भाषा में डोमेन खरीदने के इच्छुक होंगे. क्या देश में सूचना तकनीकी के बुनियादी ढांचे के साथ इसकी कोई संगति बनेगी. ऑपरेटिंग सिस्टम, ब्राउजर, कीबोर्ड, स्पीकर...कई चीजें इस नए प्रयोग के साथ जुडी हैं. उनको भी वैसे का वैसा तो नहीं रख सकते.

बेशक, आईटी के लिहाज से देश लंबी छलांगों की ओर अग्रसर है. हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के अलावा इंटरनेट का परिचालन, परिष्कार और उसका संस्कार भी तो चाहिए. उसकी क्या तैयारी है. क्या सवा सौ करोड़ की आबादी वाला ये देश सिर्फ उपभोक्ता ही बनाएगा. निर्माता इतनी देर और इतनी दूर से क्यों आ रहे हैं. इंटरनेट के मामले में भी, अब जबकि अपनी भाषाओं में हमें वेब-पता मिल रहा है तो आगे आगे हम चाहेंगे कि हम वेब के महज कन्ज्यूमर ही न बने रह जाएं, प्रोड्यूसर भी बनें. वेब कंट्रोलर भी बनें. तो बुनियादी सवाल इंटरनेट की मौजूदा शक्तियों के वर्चस्व और आधिपत्य को तोड़ने का भी है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा

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