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दुनिया

हिंसा के बदले बातचीत हो सहारा

पेशावर का स्कूली नरसंहार या सिडनी के कॉफीहाउस का बंधक कांड, हर कहीं आतंकवाद की छाप है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस कहते हैं कि साल खत्म होते होते ऐसा लग रहा है जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है.

इन सारी ताजा आतंकी घटनाओं को देख कर तो यही लगता है कि दुनिया पहले से भी ज्यादा हिंसक होती जा रही है. यह रुझान 2001 में अमेरिका पर अल कायदा के हमले के साथ शुरू हुआ और तब से तेज ही होता जा रहा है. पिछले डेढ़ दशकों में आतंकी हमलों में मारे गए लोगों की तादाद में पांचगुना वृद्धि हुई है. ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स के अनुसार 2013 में करीब 18,000 मौतें दर्ज हुईं जो एक साल पहले की तुलना में 60 फीसदी ज्यादा हैं. विशेषज्ञों के अनुसार 2014 में आंकड़े और बढ़ेंगे. यह सब तब हो रहा है जब दुनिया भर में सुरक्षा चौकस की जा रही है.

2014 के सबसे खतरनाक आतंकी हमलों के नक्शे को देखें तो सबसे ज्यादा हमले सीरिया, इराक, नाइजीरिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हुए हैं. हमला करने वाले संगठन थे, इस्लामिक स्टेट, बोको हराम, तालिबान और अल कायदा. ये सारे संगठन उस धर्म के नाम पर दूसरों को दबाने की वकालत करते हैं, जिसके नाम पर वे बोलने का दावा करते हैं, यानि इस्लाम. इसलिए स्वाभाविक ही है कि ज्यादातर पीड़ित मुसलमान हैं. आतंकवाद करने की कई वजहें होती हैं. एक वजह जो मौजूदा घटनाओं को जोड़ती लगती है, वह सउदी अरब समर्थित कट्टरपंथी और असहिष्णु सुन्नी पंथ का उत्थान और उसे रोकने की ईरान की महात्वाकांक्षा है. यह प्रतिद्वंद्विता अपना बदनुमा चेहरा दूसरे विवादों में भी दिखाती है. एक विवाद इस्राएल और अरबी दुनिया के बीच है जो पिछले साठ साल से चल रहा है. ईरान के पैसे से लेबनान और गजा में आतंकवाद को समर्थन और सीरिया में असद सरकार को मदद मिलती है. इस बात में कोई संदेह नहीं कि सीरिया में गृहयुद्ध के समाधान की फौरी जरूरत है. लेकिन 2015 की सबसे बड़ी प्राथमिकता मध्यपूर्व में स्थायी शांति है.

दूसरा मुद्दा सीरिया और इराक है. इराक में 2003 के हमले के बाद, जो पूरी तरह नाजायज था, वाशिंगटन मामले से ठीक तरीके से नहीं निबटा. शिया नेतृत्व वाली इराक सरकार ने देश के सुन्नियों को आईएस की गोद में डाल दिया. यह संगठन सीरिया में पहले से ही मजबूत था और इसके बाद उसने सीरिया और इराक में काफी कामयाबी पाई. उसने अपने बर्बर कदमों से धार्मिक आतंक की नई इबारत लिखी है.

तीसरा मुद्दा दक्षिण एशिया है. महाशक्तियों की दुश्मनी की वजह से 1979 में अफगानिस्तान में रूसी हस्तक्षेप हुआ. 1990 में तालिबान की विजय से सीआईए के पूर्व सहयोगी ओसामा बिन लादेन को पश्चिम पर हमले का मौका मिला. और उसकी वजह से 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिका का अतिक्रमण हुआ. अफगानिस्तान पर कब्जे और देश के पुनर्निर्माण की कोशिशें लोकतंत्र लाने में नाकाम रही हैं. इस साल अंतरराष्ट्रीय टुकड़ियां तालिबान को पराजित किए बिना वापस हो रही हैं और अफगानिस्तान का भविष्य संकट में दिख रहा है.

अफ्रीका में कट्टरपंथी संगठन बोको हराम नाइजीरिया और पड़ोसी देशों को आतंक के साए में डाल रहा है. कट्टरपंथियों द्वारा अपहृत सैकड़ों लड़कियां अभी भी अपने घरों में वापस नहीं लौटी हैं. हमले जारी हैं, कोई फौरी समाधान नहीं दिख रहा है. साल के अंत में उन इस्लामी विद्वानों के शब्द याद करने का समय है जो उदार इस्लाम की वकालत करते रहे हैं. विवादों की मध्यस्थता और वैध राजनैतिक शिकायतों का बातचीत के जरिए समाधान करने की रणनीति 2015 में एकमात्र विकल्प है. जब भी इसे लागू किया जाएगा वह आतंकवाद का समर्थन खत्म कर देगा.

ब्लॉग: ग्रैहम लूकस

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