1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

हिंसा के कब्जे में मिस्र

मिस्र में कई हफ्तों से भारी विरोध प्रदर्शन, हिंसा और आतंकी हमले रोजमर्रा का हिस्सा हो गए हैं. काहिरा में पूर्व राष्ट्रपति मुर्सी समर्थक प्रदर्शकारियों को हटाने में भारी हिंसा हुई. मिस्र संकट पर कुछ सवाल जवाब

मिस्र में कौन विरोधी हैं?

मुर्सी समर्थक, जिनके डेरे काहिरा से 14 अगस्त को जोर जबरदस्ती के साथ हटाए गए. उनकी मांग है कि मुर्सी को फिर से कुर्सी पर बिठाएं. मुस्लिम ब्रदरहुड के मुर्सी ने 2012 के आम चुनावों में जीत हासिल की थी. तीन जुलाई को भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद मुर्सी को पद से हटा दिया गया था. तबसे मुर्सी के समर्थक राजधानी में दो जगहों पर डेरे लगाए थे. ये समर्थक अपने परिवार के साथ वहीं रहे.
मुर्सी विरोधियों में सैन्य और उदारवादी, समाजवादी और लोकतंत्र समर्थक हैं. ये सभी लोग मुस्लिम ब्रदरहुड के विरोधी हैं. हालांकि ये सभी धड़े राजनीतिक रूप से समान विचारों वाले नहीं हैं. 

मुर्सी के तख्ता पलट के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड ने क्या रवैया अपनाया?
मुस्लिम ब्रदरहुड मुर्सी को हटाए जाने को सैन्य तख्तापलट बता रहा है. अंतरिम सरकार के साथ साझेदारी और समझौते को मुस्लिम ब्रदरहुड ने एक बैठक के दौरान सिरे से खारिज कर दिया. संगठन के प्रवक्ता अहमद आरिफ ने साफ कह दिया, "हम इस सरकार को नहीं मानते."

मुस्लिम ब्रदरहुड के अध्यक्ष मोहम्मद बादी ने बार बार मुर्सी के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन का हवाला दिया. "मिस्र की सम्माननीय जनता अपने अधिकारों का शांतिपूर्ण तरीके से बचाव करेगी." बादी को जुलाई की शुरुआत में पकड़ लिया गया. उन पर और मुस्लिम ब्रदरहुड के नेतृत्व पर हत्या की साजिश रचने के आरोप लगाए गए. मुकदमा अगस्त के अंत में शुरू होगा. मुस्लिम ब्रदरहुड के कई नेता जेल में हैं.

निकाले गए राष्ट्रपति मुर्सी को कई दिन बिना किसी वारंट के दुनिया से अलग थलग रखा गया. जुलाई के अंत में उन्हें पकड़ने का आधिकारिक आदेश दिया गया. आरोप है कि उन्होंने नुकसान पहुंचाने वाला काम किया. मुर्सी पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने फलीस्तीनी इलाके के हमास के साथ मिल कर मिस्र की पुलिस पर कई हमले किए. वे अभी भी एक अनजान जगह पर कैद में रखे गए हैं.

मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरेशनल ने मुर्सी को बिना किसी वारंट के पकड़े रखे जाने को गैर कानूनी करार दिया है. इसके अलावा मुर्सी समर्थकों को हटाने के लिए सेना ने बहुत हिंसक तरीका अपनाया.

मुर्सी को हटाए जाने के बाद से सुरक्षा स्थिति के क्या हाल हैं?

स्थिति लगातार खराब हुई है. मुर्सी समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़पों के अलावा हमले भी हो रहे हैं. उत्तरी प्रायद्वीप सिनाई में हालात और बुरे हैं. वहां इस्लामी उग्रवादी लगातार पुलिस और सैन्य चौकियों पर हमले कर रहे हैं. मुबारक की सत्ता के दौरान ही सुरक्षाकर्मी इलाके के कई हिस्सों पर नियंत्रण खो चुके थे. सत्ता के भेदभाव का शिकार और कट्टरपंथी बदवी, अल कायदा के नजदीकी जिहादी और तस्करी करने वालों के गिरोह यहां बहुत हैं और छिप कर अपना काम करते हैं.  

सैन्य प्रमुख अब्देल फतह अल सिसी की क्या भूमिका है?

कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि रक्षा मंत्री और अंतरिम सरकार के प्रमुख और सेना की कमान संभाले अल सिसी नई ताकत हैं जिन्होंने मुर्सी को हटाया. इसलिए जुलाई के आखिर में जनता ने पूरी कमान उनके हाथ में दे दी कि हिंसा और आतंक का खात्मा हो सके. लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि क्या सेना और अल सिसी लंबे समय तक सत्ता में रहना चाहते हैं या नहीं. सैन्य प्रमुख अल सिसी ने तो कई बार कहा है कि वे जितनी जल्दी संभव होगा राष्ट्रपति के हाथों सत्ता सौंप देंगे. 

सड़कों पर लगाए शिविरों को हटाने के दौरान अधिकारिक तौर पर 500 लोग मारे गए हैं. उप राष्ट्रपति मोहम्मद अल बारादेई पुलिस और सेना के तरीकों से सहमत नहीं थे इसलिए उन्होंने इसके बाद इस्तीफा दे दिया. हालांकि शांति के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता अल बारादेई मिस्र में वैसे भी विवादित थे. लेकिन पश्चिमी दुनिया ने उनसे काफी उम्मीद लगा रखी थी. आखिरकार अल बारादेई जैसा चाहते थे वैसी मध्यस्थता नहीं कर पाए. अगस्त की शुरुआत में राष्ट्रपति अदली मंसूर ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता विफल हुई बता दी. अमेरिका, जर्मनी और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि भी बातचीत के लिए काहिरा पहुंचे.  

मिस्र में गृह युद्ध की चिंता और आशंका बढ़ती जा रही है. मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता अपनी मांग पर अड़े रहे और बुधवार के बाद उन्होंने आगे भी रैलियां निकालने की घोषणा की है. इसी के साथ चरमपंथियों के पुलिस और कॉप्टिक चर्चों पर हमले भी शामिल हैं. ये हमले देश के कई इलाकों में हो रहे हैं. लेकिन इनसे मुस्लिम ब्रदरहुड ने खुद को अलग करार दिया है.

कभी लोगों का सेना में जो विश्वास था, वह खत्म हो रहा है. 2011 में भी हुस्नी मुबारक के तख्ता पलट के बाद सेना ने ही सत्ता की कमान संभाली थी. लेकिन अब हालात और हैं. इस समय सेना के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है.

रिपोर्टः नील्स नॉयमन/एएम

संपादनः महेश झा

DW.COM