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मनोरंजन

हिंदी फिल्मों का दायरा नहीं बढ़ रहा

मशहूर फिल्मकार गौतम घोष मानते हैं कि बांग्ला फिल्मों का एक इतिहास है जो बंगाल के नवजागरण से प्रभावित है. इसी का असर है कि ये फिल्में संवेदनशील होती हैं. गौतम यह भी मानते हैं कि हिंदी फिल्मों का दायरा नहीं बढ़ रहा.

सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक जैसे निर्देशकों की फिल्में इसी का उदाहरण हैं. इन्हीं लोगों की बनाए रास्ते पर आज के कुछ फिल्मकार चल रहे हैं. गौतम घोष के मुताबिक ऐसी फिल्में बनाने की कोशिश हो रही है जो संवेदनशील हों, दर्शकों को कुछ बताएं, समाज में कुछ योगदान करें .

गौतम घोष का कहना है कि इतने सालों से फिल्मों, सोशल मीडिया से जुड़ने के बावजूद उनकी सीखने की प्रक्रिया अभी भी जारी है. चाहे वह कैमरा हो या लेखन, ध्वनि संयोजन या अभिनय, अभी भी उनके सामने एक विशाल सागर है बहुत कुछ सीखने के लिये. अपनी बहुआयामी प्रतिभा का श्रेय वह उपने गुरु को देते है जिन्होंने एक्टिंग की बारीकियों के बारे में तालीम दी. गौतम घोष ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, सत्यजीत रे, दलाई लामा जैसी कई जानी मानी हस्तियों पर डाक्यूमेंट्री बनाई हैं. उनका कहना है कि इन बड़ी हस्तियों से भी उन्होंने बहुत कुछ सीखा है.

कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित गौतम घोष का मानना है कि इमानदारी से बनाई फिल्म, देशी विदेशी हर प्रकार के दर्शकों को पसंद आती है. उनकी प्रतिक्रिया एक सामान होती हैं. इतना जरूर है कि कुछ बारीकियां जो एक संस्कृति से जुड़ी होती हैं, शायद उस संस्कृति से जुड़े दर्शक अधिक समझें.

न्यू यॉर्क में अपनी नयी फिल्म शून्य अंक की स्क्रीनिंग के दौरान गौतम घोष ने डी डब्ल्यू से बात की.

आप अपने आप को किस रूप में देखते हैं?

मैं केवल फिल्म-मेकर ही नहीं रहना चाहता हूं, बल्कि मै खुद को समाज के विकास में योगदान देने वाला भी बनाना चाहता हूं. मेरा एक दायित्व है, इस समाज से बहुत कुछ लेता हूं तो मुझे कुछ वापस भी तो करना चहिये. इसीलिए ऐसे विषय चुनता हूं जिनकी सामाजिक प्रासंगिता भी हो.

आपने पहली फीचर फिल्म तेलुगु भाषा में बनायी थी, जो बहुत सफल फिल्म भी थी. क्या आज इतने वर्षों बाद एक नयी फिल्म बनाना उतना ही चुनौतीपूर्ण है जितना पहली फिल्म का बनाना रहा?

बिल्कुल, आज भी उतनी ही चुनौती रहती है. एक निर्देशक का काम है फिल्म के सब पहलू पर पकड़ रखना. सारी फिल्में एक जैसी नहीं होतीं तो उनकी चुनौती भी एक जैसी नहीं होती हैं.

आप पार और गुड़िया जैसी कई हिंदी फिल्में भी बना चुके हैं लेकिन क्या कभी ठेठ मसाला फिल्म बनाना चाहेंगे?

मसाला फिल्मों से मुझे कोई समस्या नहीं है, लेकिन वे मेरे लिए नहीं हैं. जैसी फ़िल्में मैं बनाता हूं वे मेरी शैली की होती हैं. उस शैली में अपने आप को बहुत सहज पाता हूं. मैं जो कुछ कर रहा हूं, अच्छा या बुरा, मेरे हाथ का काम है लेकिन बड़े स्तर पर बनी मसाला फिल्मों का विरोध भी नहीं करता हूं. उनका लक्ष्य मनोरंजन करने का है जो वे करती हैं. बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है उनका. आर्ट फिल्मों की तरह उन्हें बनाने में भी बहुत मेहनत लगती है. मेरा मानना है कि हर तरह की फिल्में बननी चाहिए.

आपका कहते रहे हैं कि एक ओर तो भारतीय सिनेमा बहुत बढ़ा है, लेकिन दूसरी ओर वह वास्तविकता से संपर्क खो रहा है, ऐसा क्यों?

हमारे देश में इतनी विविधता है, लेकिन उसके बहुत से पहलू भारतीय सिनेमा में मजबूती से नहीं दिखाए जाते हैं . हम लोग नकल कर रहे हैं बाहर की फिल्मों की. मैं यह नहीं कहता कि भारत की हर फिल्म आंख मूंद कर विदेश की नकल कर रही है. हमारी मिट्टी से ही कितनी कहानियां जुडी हैं लेकिन भारतीय सिनेमा का दायरा फैल नहीं रहा है, नए प्रयोग नहीं हो रहे हैं. ईरान, दक्षिण पूर्व एशिया, इंडोनेशिया या कई और जगहों पर फिल्मों में बहुत प्रयोग किये जा रहे हैं. सोच का दायरा फैल रहा है. भारतीय फिल्मों में इसकी कमी दिखाई देती है. पर इसका मतलब यह नहीं कि भारत में अच्छी ठोस फिल्में बन नहीं रही हैं. खूब बन रही हैं. कहने का मतलब है कि सारी फिल्में एक जैसी नहीं होनी चाहिए .

इंटरव्यूः अंबालिका मिश्रा, न्यू यॉर्क

संपादनः एन रंजन

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