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मनोरंजन

हाथ से बने फिल्मी पोस्टरों को मिला नया बाजार

एंग्री यंगमैन का गुस्सा दिखाते अमिताभ, तीखी नाक वाले शशी कपूर, भरे बदन के साथ धर्मेंद्र औऱ सादगी की मूरत नरगिस, लंबे समय तक भारतीय सड़कों को रंगीन बनाने वाले इनके पोस्टर अब पेरिस, लंदन, टोरंटो और बर्लिन में रंग भरेंगे.

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हाथ से बनाए गए फिल्मों के पोस्टर लंबे समय तक हिंदी फिल्मों के लिए सस्ते प्रचार का जरिया रहे लेकिन उन्हें कला का दर्जा कभी हासिल नहीं हुआ. अब जब डिजिटल पोस्टरों ने कलाकारों से उनके ब्रश छीन लिए हैं तो विदेशी बाज़ार में अचानक इन पोस्टरों के कद्रदान पैदा हो गए हैं. पेरिस की सड़कों पर इन पोस्टरों से सजी एंबेस्डर कारें नजर आएंगी तो लंदन, बर्लिन, और टोरंटो में इन्हें बेचने के लिए खास स्टोर खुले हैं.

पेरिस में लिमोना स्टूडियो नाम के स्टोर में इन पोस्टरों को बेचने वाली सोफी लेगुबिन बताती हैं कि उनकी दुकान में बिकने वाले ज्यादातर पोस्टर मुंबई के कलाकारों ने बनाए हैं. लेगुबिन अपनी दोस्त सारा लूसड्रेट के साथ मुंबई जाकर पोस्टर लाती हैं और पेरिस में एक एक पोस्टर 500 यूरो में बेचती हैं. लूसड्रेट कहती हैं कि इन पोस्टरों को बनाने वाले हाथ कमाल के हैं. हाल ही में फ्रांस में दीवार पर पेंटिंग बनाने वाले कलाकारों ने मुंबई के पोस्टर बनाने वालों के साथ मिलकर काम किया और नतीजा शानदार रहा. हालांकि अफसोस की बात यह है कि पोस्टर बनाने वाले यह हाथ भारत में तेजी से गायब हो रहे हैं. इन पोस्टरों का बाज़ार फ्रांस, स्पेन, स्विट्जरलैंड और सउदी अरब में भारत से कहीं ज्यादा बड़ा है. भारत में 50 से 60 के दशक में ये बहुत मशहूर थे बाद में ये पोस्टर डिज़ीटल तकनीक से बनाए जाने लगे.

पेंटर मानते हैं कि आपस में एकता और यूनियन न होने के कारण उनकी दशा ज्यादा खराब हुई. डिजीटल तकनीक ने उनके हाथों से काम छीन लिया और ये लोग कुछ नहीं कर पाए. दिल्ली में पोस्टर बनाने वाले विजय सिंह कहते हैं कि रातोंरात उन्हें अपनी रोजी रोटी के लिए दूसरा काम ढूंढने पर मजबूर होना पड़ा. हालांकि सबने इतनी आसानी से हार नहीं मानी. विजय के भाई रंजीत अब भी इसी पेशे से जुड़े हैं. फर्क ये आ गया है कि पहले फिल्म के पोस्टर बनाते थे अब चुनाव प्रचार के लिए होर्डिंग बनाते हैं. रंजीत के पास बहुत से सैलानी भी आते हैं जो किसी खास फिल्म के हीरो के अंदाज में अपनी तस्वीर बनवाना चाहते हैं.

हालांकि इसी बीच कई लोग पुरानी और मशहूर फिल्मों के पोस्टरों के संरक्षण के काम में भी जुटे हैं. ऐसी ही एक संस्था है ओसियान जो इस तरह के पोस्टरों का दुनिया भर में सबसे बड़ा संग्रह रखने वाला नीलामी घर है. ओसियान की कार्यकर्ता अदिती मित्तल बताती हैं कि पिछले कई सालों से उनकी संस्था इन पोस्टरों को इकट्ठा करने का काम कर रही है. ये लोग चाहते हैं कि दुनिया देखे कि हर पोस्टर दूसरे पोस्टर से कितना जुदा और अपने आप में अनोखा है. अदिती बताती हैं कि दिल्ली और मुंबई के मुकाबले पेरिस और टोरंटो जैसे शहरों में ये कला लोगों तक ज्यादा आसानी से पहुंच रही है.

दिल्ली के कलाकार बाबा आनंद बताते है कि हाथ से बने पोस्टरों की प्रदर्शनी विदेशों में लोगों को खूब लुभा रही है. आनंद कहते हैं कि पेरिस में लगी उनकी दो प्रदर्शनियों को लोगों ने खूब पसंद किया. विदेशों में रहने वाले भारतीय इन पोस्टरों के बड़े खरीदार हैं. वहीदा रहमान और दिलीप कुमार के पोस्टर देखकर लोग भावुक हो जाते हैं.

बहुत कुछ खो गया है लेकिन उम्मीद अभी बाकी है और इन उम्मीदों को परवान चढ़ा रहा है लोगों का नया शौक. पोस्टरों से सजे पर्स, टीशर्ट, डायरी, फोल्डर, माचिस लोगों को खूब भा रहे हैं. इन्हें बनाने वाली नई कंपनियां सामने आ रही हैं. मुंबई में ऐसी चीजों का कारोबार करने वाले हिनेश जेटवानी कहते हैं कि वह हाथ से बने इन पोस्टरों का दौर फिर से वापस लाना चाहते हैं. जेटवानी के पास लोग इन चीजों के अलावा दीवारों पर पेंटिंग, गैराज के शटर इस तरह की दूसरी फरमाइशें लेकर भी पहुंच रहे हैं.

हाथ से पोस्टर बनाने की कला ने जीवित रहने का सबसे बड़ा जरिया तो खो दिया लेकिन बदलते दौर ने कई दूसरे रास्ते खोले हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि नए विकल्प इस कला को मरने नहीं देंगे.

रिपोर्टः पीटीआई/एन रंजन

संपादन: ए कुमार

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