हाथ से बना ग्लाइडिंग विमान | मंथन | DW | 30.03.2015
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मंथन

हाथ से बना ग्लाइडिंग विमान

ग्लाइडिंग उड़ान भरने का बेहतरीन तरीका है. एक छोटी मोटर के सहारे ग्लाइडर 2,000 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाता है. इसके बाद पायलट मोटर बंद कर शांत आकाश का मजा उठाता है. कैसे बनाए जाते हैं अत्याधुनिक ग्लाइडर, आईये जानते हैं.

एयरोनॉटिकल इंजीनियर आक्सेल लांगे ग्लाइडर को आखिरी बार चेक कर रहे हैं, इसके बाद इसे ग्राहक को दिया जाएगा. कीमत है, दो लाख चालीस हजार यूरो. लांगे चाहते हैं कि ग्लाइडर में किसी तरह की कोई कमी न रहे. उड़ान के दौरान अगर कोई कमी सामने आई तो नतीजे घातक हो सकते हैं. लांगे एविएशन से संस्थापक आक्सेल लांगे कहते हैं, "हमारे ग्राहक बहुत ज्यादा उड़ान भरते हैं और वो जबरदस्त ट्रेनिंग वाले हैं. 25 फीसदी तो कमर्शियल उड़ान भरते हैं और विमान में बहुत ज्यादा वक्त बिताते हैं."

15 साल की उम्र से ही लांगे शौकिया तौर पर ग्लाइडर उड़ाया करते थे. आज ये एयरोनॉटिकल इंजीनियर खुद अपने ग्लाइडर बनाते हैं, "हमारे पास बहुत ही फैले डैनों वाला विमान है. इसके डैने संकरे और बहुत ही लंबे हैं. ये विमान को बहुत ही स्थिर बनाते हैं. इनके जरिए लोग बढ़िया ग्लाइडिंग कर सकते हैं. एक किलोमीटर की ऊंचाई पर ये 56 किलोमीटर की रफ्तार से ग्लाइड कर सकता है."

हल्का और मजबूत

विमान की बॉडी कार्बन फाइबर से बनायी गयी है. 25 मैकेनिक मिलकर विमान बनाते हैं. कार्बन फाइबर की दर्जनों परतों को एक के ऊपर एक कर चिपकाया जाता है. इसमें बहुत मेहनत लगती है. कंपनी महीने में एक ही विमान बनाती है, पूरा हाथ का काम. हर चीज को मजबूती से लपेटा जाता है. अगर आप इस तरह के आकार को रोबोट के जरिए बनाना चाहते हैं तो हाई फाई कंप्यूटर प्रोग्राम और रोबोटों की जरूरत होगी, ये बहुत ही जटिल प्रक्रिया होगी. लांगे के मुताबिक इन्हें हाथ से बनाना ज्यादा अच्छा है और सस्ता भी.

इंजीनियरों की मदद से वे विमान को डिजाइन करते हैं. भार कम से कम रखना होगा, तभी विमान सिर्फ हवा की मदद से आसानी से उड़ान भर सकेगा. यही वजह है कि ग्लाइडर बहुत ही पतले और हल्के दिखते हैं. ये ग्लाइडर इतने हल्के हैं कि इन्हें हाथ से उठाया भी जा सकता है. बॉडी का वजन महज 50 किलो.

इंजीयरिंग के साथ हुनर भी

हर बारीकी का ध्यान रखना जरूरी है, जैसे डैनों के ये छेद, इनसे होकर तारें गुजरेंगी. ज्यादातर कर्मचारियों ने विमान निर्माण की पढ़ाई भी नहीं की, जैसे मिषाएल किमले, जो फिलहाल दरवाजा फिट कर रहे हैं. वो एक कारपेंटर हैं, जो विमान निर्माण की ओर खींचे चले आए. किमले कहते हैं, "हम एक शानदार समय में जी रहे हैं. 100 साल पहले ये बहुत ही रोमांचक काम हुआ करता था, लोगों ने अपनी बेहतरीन कोशिशें कीं, लेकिन सब कुछ सफल नहीं हुआ और आज हम ऐसे कारनामों के गवाह हैं."

कंपोजिट फाइबर से 200 पार्ट्स बनाये जाते हैं. टेल रडर बनाने के लिए दो हिस्सों को आपस में चिपकाया जाता है. अब ये एक हैं. यहां दो हिस्सों का जुड़ाव देखा जा सकता है. यहां मोल्डिंग सेपरेशन भी है, ये आपस में जुड़े हैं. सारे हिस्से जुड़ने के बाद ही इसे टेस्ट किया जा सकता है.

इलेक्ट्रिक मोटर

ये काम हैंगर में होता है. अब ढांचे में मोटर और तकनीकी उपकरण लगाए जाएंगे. बैटरी भी यहीं फिट की जाएगी. बैटरी इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है. मोटर प्रोपेलर के बीच में लगती है. ग्लाइडिंग हाइट तक पहुंचाने के बाद पंखा बंद हो जाता है. लांगे बैटरी से चलने वाले प्रोफेलर का कारण बताते हैं, "इलेक्ट्रिक उपकरण बहुत ज्यादा कंपन नहीं करते और इनकी मैनटेनेन्स भी नहीं करनी पड़ती है, रिपेयरिंग और इस्तेमाल भी बहुत आसान है."

फाइनल असेंबली आसान दिखती है. डैने आराम से विमान से जोड़े जाते हैं. इसका मतलब है कि विमान को कहीं भी ले जाकर जोड़ा सकता है, ग्लाइडिंग के शौकीनों के लिए एक बढ़िया तरीका.

काम पूरा होने के बाद बॉस खुद हर प्लेन को टेस्ट करते हैं. मोटर की मदद से वो विमान को 2,000 मीटर की ऊंचाई पर ले जाते हैं. और ध्यान से देखिये, ऊंचाई पर मोटर बंद. इसके बाद विमान हवा के सहारे ही आकाश का आनंद उठाता रहेगा.

क्रिस्टियान प्रिसेलियुस/ओएसजे


DW.COM