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मनोरंजन

हाथियों के आशीर्वाद देने पर लग सकती है रोक

तमिलनाडु में हाथियों के आशीर्वाद देने पर सरकार रोक लगा सकती है. तमिलनाडु के मंदिरों में श्रद्धालुओं को हाथी आशिर्वाद देते हैं और इसके बदले उनके मालिक को थोड़ा बहुत धन मिलता है लेकिन हाथियों को भारी यंत्रणा.

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आशीर्वाद पर रोक

भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में राज्य वन विभाग ने मंदिर के अधिकारियों से मांग की है कि वह पूरे राज्य में हाथियों से आशीर्वाद दिलाने की प्रथा पर रोक लगाएं. क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में हाथियों को भारी यंत्रणा झेलनी पड़ती है. वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, हाथियों के प्रशिक्षक उन्हें श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देने के लिए जोर जबरदस्ती करते हैं. मंदिर में आने वाले लोगों से थोड़े पैसे पाने के लिए वे हाथियों

Elefanten Festival in Indien

को प्रताड़ित करते हैं और इस बारे में विचार भी नहीं करते. हमें कई रिपोर्टें मिली हैं कि महावत इन हाथियों को इतनी यंत्रणा देते हैं कि वे घायल हो जाते हैं.

इससे भी बड़ी बात ये है कि हाथियों को भी मनुष्य की तरह सर्दी, खांसी और टीबी होता है जो कि लोगों में फैल सकता है. चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन आर सुंदरराजु ने हाल ही में एक सर्क्यूलर जारी किया है जिसमें मंदिर चलाने वाली धर्माथ संस्थाओं को निर्देश दिया है कि वे इस प्रथा को बंद करें.

इस प्रतिबंध से हाथियों का तनाव भी थोड़ा कम होगा. वन विभाग हर साल एक महीने हाथियों के तनाव को कम करने के लिए शिविर लगाता है. ये शिविर नीलगिरी जिले में मधुमति जंगल में हाथियों के अभयारण्य में आयोजित किए जाते हैं. यहां इनके लिए ट्रेनिंग सेंटर भी है.

बीमारी से बचाने के लिए हाथियों को दवाई के साथ सही खाना दिया जाता है. अधिकारियों का दावा है कि सात साल से चले आ रहे ये शिविर सफल रहे हैं. मंदिर चलाने वाली संस्थाओं को कहा गया है कि हाथियों को कॉन्क्रीट की जमीन पर नहीं खड़ा रखें इससे उनके पैरों को तकलीफ हो सकती है. मंदिरों के अधिकारियों का कहना है कि वे इस रोक के अलग अलग पहलुओं पर गौर कर रहे हैं और वे सुनिश्चित करेंगे कि इस तरह के प्रतिबंध से श्रद्धालुओं की भावना को ठेस नहीं लगे. वहीं हिंदू भक्त सभा ने इस रोक का विरोध किया है. उनका कहना है कि हाथियों से आशीर्वाद लेना हिंदुओं के लिए पवित्र है.

लेकिन क्या आशीर्वाद देने वाले उस मूक प्राणी को यंत्रणा देना सही है....

रिपोर्टः एजेंसियां/आभा एम

संपादनः एम गोपालकृष्णन

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