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ब्लॉग

हाईकोर्ट के फैसले को तटस्थ नजरिए से परखना जरूरी

भारत में न्यायिक सक्रियता और अनूठे फैसले आना नई बात नहीं है. इस दायरे में महिला सुरक्षा और यौन अपराध की समस्या से निपटने के लिए समय समय पर हुए ऐतिहासिक फैसलों से इतर गाहे ब गाहे कुछ फैसले विवादों के साए में आते रहे हैं.

हाल ही में बलात्कार के एक मामले में दोषी को पीड़िता के साथ समझौते की सलाह देने के हाईकोर्ट के फैसले ने नई बहस को जन्म दे दिया है. मद्रास हाईकोर्ट ने अपने विवादित फैसले में सात साल की सजा सुनाए गए दोषी के साथ पीड़ित महिला को मध्यस्थता का परामर्श दिया. हालांकि इस फैसले के नकारात्मक पहलू पर समाजविज्ञानियों से लेकर कानूनविदों की त्यौरियां चढ़ना स्वाभाविक है. लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले को मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में तटस्थ एवं निरपेक्ष नजरिए से भी परखना जरुरी है. फैसले पर तात्कालिक प्रतिक्रिया के तथ्य निचली और उच्च अदालत के नजरिए में भेद की हकीकत को भी स्पष्ट तौर पर उजागर करते हैं.

इस मामले में 15 साल की किशोरी के साथ बलात्कार के आरोपी को निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई. इस बीच पीड़िता एक बच्चे की मां बनी और अब युवक ने हाईकोर्ट में निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी. अदालत ने बदली हुई परिस्थितियों के मद्देनजर दोषी और पीड़िता को मध्यस्थता का परामर्श देते हुए सजा को बरकरार रखा और अपील का निस्तारण कर दिया. फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि दोषी को अपने किए पर न सिर्फ पछतावा है बल्कि उसकी भूल के परिणामस्वरूप जन्मे बच्चे के प्रति उसकी सहानुभूति इस मामले में भविष्य के लिए उम्मीद की किरण जगाती है. इसलिए अदालत ने सजा को बरकरार रखते हुए पीड़िता को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने और बच्चे को जीवनपर्यंत सामाजिक दंश से बचाने के लिए मध्यस्थता का परामर्श दिया है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि अदालत ने पीड़िता और दोषी पर मध्यस्थता की बाध्यता आरोपित नहीं की है. यह सही है कि कानून लकीर का फकीर होता है. उसे सिर्फ तथ्यों पर आधारित फैसलों की दरकार होती है. ऐसे में बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में मध्यस्थता की पहल चौंकाने वाली और आलोचनाओं को आमंत्रित करने वाली है. ऐसे फैसलों के भविष्य में दुरुपयोग की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. खासकर महिलाओं के प्रति हिंसा की लगातार गहराती समस्या को देखते हुए इसके दुरुपयोग का खतरा भविष्य के लिए चुनौती है.

इसके बावजूद महिला अपराध और पारिवारिक हिंसा से जुड़े मामलों के वरिष्ठ वकील अरविंद जैन के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पहली नजर में ही खारिज करना फैसले के साथ न्याय नहीं होगा. इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को ध्यान में रखकर ही इसकी समीक्षा मध्यस्थता के परिणाम को परखने की संयत पहल के साथ करनी चाहिए. अगर यह पहल कारगर साबित नहीं होती है तो फिर सर्वोच्च अदालत फैसले को खारिज करने के लिए स्वतंत्र है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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