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विज्ञान

हाइड्रोजन हासिल करने का तेज तरीका इजाद

वैज्ञानिकों ने धरती की गहराई पर मिलने वाले पत्थरों से हाइड्रोजन हासिल करने का एक ऐसा तरीका ढूंढ लिया है जिससे हाइड्रोजन जल्दी मिल पाएगी और उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल भी हो सकेगा.

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एक शोध के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने धरती की सतह से काफी नीचे पाए जाने वाले पत्थरों में घटने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज कर हाइड्रोजन निकालने में कामयाबी पायी है. रॉकेट से लेकर फ्यूल सेल नाम की इस बैटरी में ऊर्जा के स्रोत के रूप में काम आने वाली हाइड्रोजन प्रदूषण बिल्कुल नहीं फैलाती. इस सेल में हाइड्रोजन की ऑक्सीजन के साथ हवा में प्रतिक्रिया कराई जाती है जिससे बिजली पैदा होती है और साथ ही पानी बनता है. इस तरह हाइड्रोजन या फ्यूल सेल से कोई ग्रीन हाउस गैस नहीं निकलती और वायु प्रदूषण भी नहीं होता है.

फ्यूल सेल का इस्तेमाल कुछ कारों में भी किया जा रहा है. कम मात्रा में मिलने की वजह से ये मंहगी तकनीक है और इसीलिए अभी तक बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल शुरू नहीं हो सका है.

ऐसे मिलता है हाइड्रोजन

फ्रांस के शोधकर्ताओं ने बताया है कि धरती की गहराई में बहुत ऊंचे तापमान और दबाव के क्षेत्र में जब एल्युमिनियम ऑक्साइड की मौजूदगी में पानी, ओलिविन नामके एक पत्थर से मिलता है तो हाइड्रोजन तेजी से बनने लगती है.

Deutschland Auto BMW Hydrogen 7

कार निर्माता कंपनी बी एम डब्ल्यू की हाइड्रोजन 7 कार

एल्युमिनियम ऑक्साइड मिलाने से प्राकृतिक रूप से होने वाली रासायनिक क्रिया करीब सात से 50 गुना तक तेज हो जाती है. लेकिन इसके लिए तापमान को 200 से 300 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए और दबाव भी सागर की गहराई के दोगुने स्तर का होना चाहिए. आज कल प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन निकालना सबसे ज्यादा प्रचलित है जिसके लिए कहीं ज्यादा ऊंचे तापमान की जरूरत होती है. इस प्रक्रिया में अवशेष के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड बनती है जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैस है. इस तरह नई तकनीक के इस्तेमाल से ऊर्जा और पैसों के साथ पर्यावरण भी बचेगा.

लेकिन लंबा है इंतजार

ये खोज दस साल तक चलने वाले बहुत बड़े शोध का हिस्सा है जिसका नाम डीप कार्बन ऑब्जरवेट्री (डीसीओ) है. ये शोध 2019 में पूरा होगा. इसके तहत 40 देशों के एक हजार वैज्ञानिक मिल कर काम कर रहे हैं.

इस नए तरीके से बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन तैयार करने से पहले काफी काम करने की जरूरत है. न्यूयार्क के रॉकफेलर विश्वविद्यालय की शोधकर्ता जेस ऑसुबेल कहती हैं, "इसे (हाइड्रोजन को) कार्बन फ्री तरीके से बनाकर दुनिया भर की जरूरतें पूरी करने लायक मात्रा में बनाने में करीब 50 साल लग सकते हैं," जेस को लगता है कि अगर फ्यूल सेल की मांग ऐसे ही जोर पकड़ती रही तो बाजार के दबाव में ये तकनीक जल्दी भी लायी जा सकती है.

आरआर/ओएसजे (रायटर्स)

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