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दुनिया

हांफते हुए गांव लौटते भारतीय

अब भी बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में लाखों लोग ग्रामीण इलाकों से बड़े शहरों की तरफ हर रोज पलायन करते हैं. लेकिन प्रदूषण एक ऐसा मुद्दा बन गया है कि लोग एक बार फिर लौटकर छोटे शहरों या गावों में बसने लगे हैं.

नमिता सिंह जब लखनऊ में रहती थीं तो अक्सर उनकी छोटी बेटी के गले में सूजन रहती थी. लखनऊ यानि नवाबों का शहर, जिसके खानपान और नवाबी कला की भव्यता तो बहुत है, लेकिन हर साल सर्दियां उसे धुंध से ढंक देती हैं.

जब नमिता के पति का ट्रांसफर लखनऊ से देहरादून हुआ तो हिमालय की तलहटी में बसे शहर में रहते हुए उनकी बेटी की सूजन की परेशानी काफी हद तक कम हो गई. इसलिए जब कुछ साल बाद उनके पति का ट्रांसफर दिल्ली हुआ तो उनकी पसंद साफ थी. नमिता और बेटी देहरादून में ही रुके और पति नौकरी के लिए दिल्ली चले गये.

हाल ही दिल्ली स्मॉग की समस्या से भयानक रूप से जूझ रहा था. नमिता राहत की सांस लेते हुए कहती हैं कि उन्हें इस बात से राहत है कि वे वहां नहीं रह रही हैं. उनके पति हर दो हफ्ते में दिल्ली से देहरादून आते हैं. वह कहती हैं, "इतने बुरे प्रदूषण स्तर से साथ मैं दिल्ली में रहने के बारे में सोच भी नहीं सकती.” वो बताती हैं कि उनकी बेटी देहरादून की साफ हवा में काफी बेहतर है.

प्रदूषण की इस समस्या से भारत में 'रिवर्स माइग्रेशन' का चलन देखने में आ रहा है. मतलब ये कि पहले लोग कामकाम और बेहतर जिंदगी के लिए गांवों या छोटे शहरों से बड़े शहरों या महानगरों का रुख कर रहे थे. लेकिन इस समय लोग एक बार फिर छोटे और ऐसी जगहों की ओर लौटकर जा रहे हैं, जहां जिंदगी कम से कम स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर है.

हालांकि यह बहुत बड़ी संख्या में नहीं दिख रहा है लेकिन कई हाई प्रोफाइल मामले ऐसे रहे जो पिछले दिनों सुर्खियों में छाए रहे. हाल ही में दिल्ली में प्रदूषण की समस्या के चलते कोस्टा रिका की राजदूत रहने के लिए दक्षिण भारत चली गईं. दिल्ली की दूषित वायु ने उन्हें काफी बीमार कर दिया था.

आंकड़ों के मुताबिक 2015 में भारत में प्रदूषण की वजह से करीब 25 लाख लोगों की मौत हुई. यह संख्या दुनिया के किसी भी और देश की तुलना में सबसे अधिक है. नई दिल्ली इस वक्त दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है. पंजाब, हरियाणा में फसलों के जलाने, निर्माण कार्यों की धूल और ट्रैफिक की वजह से हर साल शहर पर कई महीने धुंध छायी रहती है. दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल का कहना है कि 2 करोड़ लोगों का यह शहर गैस चैंबर बन चुका है.

इन दिनों फेस मास्क की खरीद आसमान पर है. इंटरनेट चैट रूम्स इन सवालों से भरे पड़े हैं कि घरों में कौन सा एयर प्यूरिफायर लगवाना अच्छा होगा. लेकिन कुछ लोग हैं जो इससे भी बड़े और सख्त कदम उड़ा रहे हैं. वे रहने के लिए दूसरी जगहों पर जा रहे हैं. मतलब या तो पहाड़ी इलाकों पर या तटीय शहरों में.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य 2020 तक 100 शहरों के आधुनिकीकरण के लिए तेज इंटरनेट, 24 घंटे बिजली बिजली, पानी की आपूर्ति, बेहतर परिवहन और यूरोप के शहरों जैसा जीवन स्तर तैयार करना है. लेकिन विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के अनुसंधान और एडवोकेसी ग्रुपकी कार्यकारी निदेशक अनुपमा रॉय चौधरी ने कहा कि ऐसे प्रयासों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक योजना शामिल होनी चाहिए. उन्होंने कहा, "वायु प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन यह एक भ्रम है कि केवल बड़े शहर ही प्रदूषित हैं. छोटे शहरों में भी प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है. तो आप कहां कहां से भाग सकते हैं?

ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हजारों लोग हर रोज बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं. उनमें से ज्यादातर लोग बस्तियों में निम्न जीवन स्तर के साथ रहने को मजूबर होते हैं. ये वर्ग खौस तौर पर बड़े स्तर पर प्रदूषण का शिकार होते हैं.

कुछ साल पहले टीवी के एक जानेमाने एंकर ने दिल्ली की जगह अपना घर बदलकर उत्तराखंड में रहना शुरू किया. उन्होंने कहा कि वे ज्यादा साफ और ज्यादा शांत जगह रहना चाहते हैं. जो लोग नौकरी के लिए दूसरे शहरों में जा रहे हैं वे भी इन दिनों आर्थिक सुविधाओं के साथ साथ प्रदूषण के बारे में सोचते हुए अपने फैसले ले रहे हैं.

अपने गांव से चेन्नई में आकर कैब ड्राइविंग करने वाले विनोद कुमार कहते हैं कि वे वापस अपने गांव जाकर खेती करने के बारे में विचार कर रहे हैं. वह कहते हैं कि उन्हें लगता है कि वह कितने किस्मत वाले थे कि उनके पास साफ हवा और साफ पानी था.

एसएस/ओएसजे (थॉमस रॉयटर्स फाउंडेशन)

 

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