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दुनिया

हर साल की बाढ़ से कैसे निपटेगा श्रीलंका

श्रीलंका में हर साल आने वाली बाढ़ से सैकड़ों लोगों की मौत हो रही है, जबकि लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं. मौसम विभाग शुरुआती चेतावनी भी नहीं दे पा रहा है ऐसे में कैसे मिलेगी राहत?

श्रीलंका लगातार भयानक बाढ़ से लेकर भीषण सूखे तक का सामना कर रहा है. मई माह में आई बाढ़ और भू-स्खलन में 216 लोगों की मौत हुई, 76 लोग लापता हो हो गए और 6 लाख से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए. जबकि ठीक एक साल पहले ही आई भीषण बाढ़ में 100 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. 

श्रीलंका के पेरादेनिया विश्वविद्यालय के कृषि विभाग में जलवायु विज्ञान के प्रमुख रंजीत पुन्यवरदेना का कहना है कि "सिर्फ आम लोग ही नहीं बल्कि सरकार भी वैसी ही है. वे प्राकृतिक आपदाओं को अलग अलग घटनाओं के रूप में देखते हैं और उनका मुख्य मकसद चल और अचल संपत्ति का बचाना है, जिंदगियां नहीं. ”

द्वीप का उत्तरी हिस्सा हाल ही में हुई बारिश के बावजूद पिछले दस महीने से सूखे का सामना कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के मुताबिक इस सूखे के चलते 2017 के आखिर तक होने वाली चावल की पैदावार पिछले एक दशक में सबसे कम होगी.

पिछले तीन सालों से श्रीलंका में आ रही बाढ़ में हर साल औसतन 100 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है और हर बाढ़ के बाद आपदा प्रबंधन अधिकारी एक जांच शुरू करते हैं कि बाढ़ आने की वजह क्या रही.  

इस वर्ष की बाढ़ के बाद प्रारंभिक चेतवानी न दे पाने पर श्रीलंका के आपदा प्रबंधन केंद्र और मौसम विज्ञान विभाग की व्यापक रूप से आलोचना की गई थी. मौसम विज्ञान विभाग के अधिकारियों के मुताबिक परिष्कृत रडार प्रौद्योगिकी न होने की वजह से बाढ़ की विस्तृत चेतावनी जारी नहीं की जा सकी.

हालांकि, इसके बाद आपदा प्रबंधन से बाढ़ की प्रारंभिक चेतावनी जारी करने की प्रक्रिया को बेहतर करने की कोशिश की है. सरकार जापान के साथ 22 करोड़ डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर कर नए रडार स्टेशन स्थापित कर रही है. 

हालांकि पुन्यवरदेना ने कहा कि "यह देखना अभी बाकी है कि यह प्रकिया क्या आगे आने वाले सालों में बाढ़ में होने वाली मौतों की संख्या कम कर देगी. नीतियां स्पष्ट रूप से दस्तावेजों और योजनाओं में हैं. मुझे नहीं लगता कि हमें नयी नीतियों की जरूरत है. हमें जरूरत इस बात की है कि इन्हें लंबे वक्त तक के लिए ठीक से लागू करें.”

आपदा प्रबंधन के अधिकारियों के मुताबिक सरकार की नीतियां बनाने वालों तक उनकी पहुंच न होने के कारण भी बहुत से बदलाव नहीं हो पाते हैं. आम तौर पर अधिकारी उन तक तभी पहुंच पाते हैं जब कोई आपदा हो चुकी होती है.

आपदाओं से निपटने के लिए समन्वय की कमी भी एक बड़ा कारण हो सकती है. मई माह में आई बाढ़ से निपटने के लिए देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने अलग अलग कमेटी बिठायी. जिसने नयी तरह की मुश्किलें पैदा कीं. इसके अलावा कृषि, जल, आपदा और मौसम विज्ञान का एक साथ काम करना भी अपने आप में चुनौतीपूर्ण होता है. 

एसएस/एनआर(रॉयटर्स)

 

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