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दुनिया

हर जगह घूरती पुलिस से लोगों को दिक्कत

अयोध्या विवाद के फैसले के लिए जबरदस्त सुरक्षा प्रबंधों पर बुद्धिजीवी वर्ग उंगलियां उठाने लगा है. बुद्धिजीवी अयोध्या विवाद पर किसी नाउम्मीदी से सहमत नहीं दिखते.

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सरस्वती सम्मान से सम्मानित जाने माने उर्दू लेखक शम्सुर्रहमान फारूकी का कहना है कि भारत के इतिहास में साम्प्रदायिकता के तत्व नहीं मिलते. वह कहते हैं कि साहित्य-संस्कृति की रचनात्मक भूमिका से किसी भी नकारात्मक स्थिति के विरुद्ध जनमानस तैयार किया जा सकता है.

मशहूर उर्दू समालोचक प्रोफ़ेसर अकील रिज़वी का कहना है के फ्लैग मार्च के रिहर्सल,  गली चौराहों पर हर शख्स को घूरती पुलिस से अमन और चैन का वातावरण नहीं बनता. इससे आम आदमी के बीच बेवजह शंका और दहशत का माहौल बन रहा है. इलाहबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर अली अहमद फातिमी कहते हैं कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर बुद्धिजीवियों, कलाकारों और संस्कृतकर्मियों को दरकिनार कर मौलवियों और साधू संतों के विचार को ही मीडिया और सरकार प्रमुखता दे रही है.

Indien Unruhen in Ayodhya

प्रख्यात सहित्यकार अमरकांत कहते हैं कि आज साम्प्रदायिकता के सांस्कृतिक विरोध की ज़रूरत है. शासन-प्रशासन को धर्मनिरपेक्ष संस्कृति और सामाजिक सौहार्द के निर्माण कि गौरवपूर्ण विरासत में सृजनधर्मियों कि भूमिका को पर्याप्त महत्व देना चाहिए. वरिष्ठ साहित्यकार व कवि बुधसेन शर्मा का मानना है कि फ्लैग मार्च करने से बेहतर होता कि संस्कृतकर्मियों के माध्यम से सरकार इस मुद्दे पर लोगों के बीच सौहार्द को मज़बूत करने की कोशिश करती.

वाराणसी में शहनाई नवाज़ उस्ताद भारतरत्न बिस्मिल्लाह खान ने कभी कहा था, “मैं जो कुछ भी हूं सब गंगा की कृपा से हूं”. उनके शहर में प्रख्यात तबला नवाज़ पंडित किशन महाराज के बेटे पूरण महाराज कहते हैं कि जैसे दायां या बायां तबला अकेले नहीं बज सकता, दोनों मिल कर ही सुर बनेंगे, उसी तरह हिन्दू मुस्लिम बनारस और भारत की पहचान है और रहेगी. उनका भी कहना है कि सरकार को सांस्कृतकर्मियों को आगे करना चाहिए. काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संगीत प्रवक्ता प्रभाष महाराज कहते हैं कि संगीत मज़हब नहीं जानता. बनारस का रस हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई से मिलकर बना है. इस पर किसी कि आंच नहीं आ सकती.

उधर अयोध्या का हाल यह है कि एक तरफ विवादित बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि है तो दूसरी तरफ साम्प्रदायिक सदभाव की सबसे अनोखी मिसाल भी यहीं मिलती है. यहां के मुमताज़ नगर में एक डॉक्टर सैयद माजिद अली हैं जो अपने पैसे से हर वर्ष राम लीला का आयोजन करते चले आ रहे हैं. और इसी अयोध्या में मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम करने पर राष्ट्रद्रोह का मुक़दमा भी कायम हो चुका है जो अभी अभी चल रहा है. वाराणसी से गोंडा चलें तो यहां कच्चे बाबा के आश्रम के संरक्षक निक्कू बाबा कहते हैं, “मंदिर मस्जिद एक सामान-दोनों में अल्लाह भगवान, इनमे भेद करे जो कोई वो है अज्ञानी नादान'.

यहां के किसान नेता सुरेश चन्द्र त्रिपाठी कहते हैं कि बेमतलब हौवा खड़ा किया जा रहा है. जो फैसला होगा उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल हो जाएगी. रंगकर्मी देवव्रत सिंह का कहना है कि ऐसे वक़्त पर रहनुमाओं को आगे आना चाहिए. यहां से कुछ दूर बहरैच है जहां सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर हर साल मेले में मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू अकीदतमंद आते हैं. इसी के पास श्रावस्ती है जो कभी गौतम बुद्ध की स्थली रही है. यहां भी भरी पुलिस फ़ोर्स तैनात है जिससे लोगों में दहशत है.

पूरब का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर में कैप्टन लक्ष्मी सहगल हैं जिन्होंने 4 नवम्बर 1984 को हजारों की भीड़ के बीच से एक सिख परिवार को मरने से अकेले बचाया था. पुलिस को बुरा भला कहती हुई वह अकेले निकल पड़ी थीं. उनकी बेटी माकपा नेता सुभाषिनी अली सहगल आज भी साम्प्रदायिकता विरोधी मुहीम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं. सपा विधायक मरहूम हाजी मुश्ताक सोलंकी में वो

Militante Hindus schwingen Fahnen der rechten Bajrang Dal Partei in Bombay

कूवत थी कि प्रशासन उन्हीं की मदद से साम्प्रदायिक उन्माद रोकता था. आज उनके बेटे आर्यनगर से विधायक हैं और अपने पिता की विरासत को संभाले हुए हैं.

इस तरह के हजारों उदाहरण हर शहर में मौजूद हैं. लेकिन सरकार न जाने क्यूं सामाजिक संस्थाओं, कलाकारों, सांस्कृतकर्मियों, रंगकर्मियों, लेखकों, कवियों और शायरों के बजाय फ़ोर्स पर ज्यादा भरोसा कर रही है. इतने ज़बरदस्त सुरक्षा प्रबंधों का नतीजा है कि सब्जी, दाल, आटा, चावल, शक्कर आदि सब महंगा होने लगा है क्योंकि लोग ज़रूरत का सामान घरों में भरने लगे हैं. लखनऊ और अयोध्या के आस पास सभी होटलों में बुकिंग हो चुकी है. लखनऊ आने जाने के न तो एयर टिकट मिल रहे हैं और न ही ट्रेन के. हर तरफ एक अजीब सी सनसनी है जिसे सरकार कि अति सक्रियता का नतीजा कहना ज्यादा मुनासिब होगा. क्योंकि इस बार अयोध्या के मामले में आम आदमी एकदम निष्क्रिय है. सरकार ही सक्रिय दिख रही है. साम्प्रदायिकता पर काफी काम कर चुके, कई दंगों को रोकने का तजुर्बा रखने वाले आईपीएस अधिकारी और इस समय वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी यूनिवर्सिटी के वीसी विभूति नारायण राय कहते हैं कि इतनी फ़ोर्स लगाने का असर काउंटर प्रोडक्टिव भी हो सकता है.

रिपोर्टः लखनऊ से सुहेल वहीद

संपादनः वी कुमार