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दुनिया

हर छिपकली के लिए दस हज़ार यूरो

औद्योगिक प्रगति के चलते अनेक प्रजातियों का अस्तित्व ख़तरे में है. उनकी रक्षा के लिए जर्मनी व यूरोपीय संघ में कानून बनाए गए हैं. मसलन छिपकलियों की एक प्रजाति को बचाने के लिए हाइवे के एक हिस्से में सुरंग बनाना पड़ रहा है.

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हेस्से प्रदेश में ए 44 राष्ट्रीय हाइवे को 6 किलोमीटर की लंबाई में हेलसा से लिष्टेनाउ तक बढ़ाना था. कोई समस्या नहीं थी, लेकिन फिर पता चला कि इसी रास्ते पर बंजर ज़मीन में छिपकलियों का एक बसेरा है, जिसे यूरोपीय संघ में खत्म होने के ख़तरे में बताया गया है. उनके बसेरे को नष्ट करने की इजाज़त नहीं मिलेगी. सिविल इंजीनियरों को काफ़ी सोच-विचार के बाद एक हल सूझा. अब चार किलोमीटर लंबा एक सुरंग बनाया जाएगा, जो छिपकलियों के इस प्रांत के नीचे से जाएगा.

हेस्से प्रदेश में किसी हाइवे में अब तक इतना लंबा सुरंग नहीं था. अब छिपकलियों की कृपा से यह बनने जा रहा है. 6 किलोमीटर लंबे हाइवे के निर्माण का खर्च 25 करोड़ यूरो आंका गया था. 4 किलोमीटर सुरंग के लिए अब यह खर्च 5 करोड़ अधिक, यानी 30 करोड़ यूरो हो जाएगा. इस बस्ती में माना जाता है कि 5 हज़ार छिपकली रहते हैं. यानी हिसाब लगाया जाए तो हर छिपकली की रक्षा के लिए दस हज़ार यूरो, यानी कमोबेश सवा 6 लाख रुपए.

Feuersalamander

हर छिपकली के लिए छह लाख रुपये

पिछले दस सालों से पर्यावरण रक्षा के नियम काफ़ी कड़े हो चुके हैं. पहले निर्माण की अनुमति देते समय इसका ख़्याल रखना पड़ता था कि सड़कों, ब्रिजों या रेल की पटरियों के निर्माण के चलते पर्यावरण को होने वाला नुकसान टाला जाए. इस बीच इस तरह का नुकसान पहुंचाना गैरकानूनी हो चुका है. अधिकारियों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है कि छिपकलियों को नुकसान पहुंचाते हुए हाइवे निर्माण की अनुमति दें.

मामला सिर्फ़ छिपकलियों का नहीं है. हनोवर से बर्लिन के बीच तेज़ गति की आईसीई रेल पटरी के लिए ब्रांडेनबुर्ग प्रदेश में 6 किलोमीटर की लंबाई में सात मीटर ऊंची मिट्टी की दीवार बनानी पड़ी. इस इलाके में हुकने की एक विरल प्रजाति रहती थी. सिर्फ़ 50 ऐसे पंछी रह गए थे. मिट्टी की दीवार बनाई गई, उनके लिए जंगली इलाका तैयार किया गया. फ़ायदा भी हुआ. इस बीच उनकी संख्या एक सौ तक पहुंच गई है. खर्च पड़ा है दो करोड़ यूरो. यानी हर हुकने के लिए दो लाख यूरो, या सवा करोड़ रुपए.

इन कानूनों की वजह से हर निर्माण से पहले विशेषज्ञों की रिपोर्ट मांगी जाती है, और विशेषज्ञों का पेशा अच्छा ख़ासा पनप रहा है. कभी पंछियों का विशेषज्ञ, कभी शोर का विशेषज्ञ, तो कभी गैसों का विशेषज्ञ.

ज़ाहिर है कि छिपकलियों के इस मामले से सारे देश में चीखपुकार मच गई है. पर्यावरण रक्षा ज़रूरी है, लेकिन एक छिपकली के लिए दस हज़ार यूरो, या एक हुकने के लिए दो लाख यूरो? यह तो हद हो गई.

वैसे एक बात पूछी नहीं जा रही है. क्या उन बंजर इलाकों में से, जंगलों में से हाइवे को ले जाना ज़रूरी है. हाइवे तो बहुत बन चुके हैं, क्या हाइवे के लिए इंसानी प्यास मिटी है? मिटेगी?

रिपोर्ट: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: एन रंजन

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