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मनोरंजन

हमेशा चरित्र अभिनेता रहा हूं: कुलभूषण खरबंदा

अस्सी के दशक में फिल्म शान से शाकाल के तौर पर विलेन के किरदार से करियर की शुरूआत करने वाले कुलभूषण खरबंदा खुद को आलसी मानते हैं. चकाचौंध से दूर वह अपना काम करते रहने में विश्वास करते हैं. डॉयचे वेले की खास बातचीत.

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इन दिनों थिएटर भी कर रहे हैं

कुलभूषण खरबंदा ने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि किसी फिल्म में उनकी भूमिका कितनी बड़ी या छोटी है. वह खुद को एक चरित्र अभिनेता मानते हैं. मितभाषी और मृदुभाषी खरबंदा कहते हैं कि वे औरों की तरह अपने बारे में बोल नहीं सकते. उनके मुताबिक, "मुझे बनावटीपन नहीं जंचता. मुझे मेरे संवाद बता दीजिए. उसके बाद मेरा व्यक्तित्व ही बदल जाएगा."

अपने लंबे करियर में खरबंदा ने जहां मंडी और अर्थ जैसी कला फिल्मों में काम किया है, वहीं शान और बॉर्डर जैसी व्यावसायिक फिल्मों में भी शानदार अभिनय किया. सिनेमा की दोनों धाराओं में काम कर अपनी पहचान बनाने वाले इस अभिनेता को कला बनाम व्यावसायिक फिल्म की बहस में उलझना पसंद नहीं है. वह कहते हैं, "अभिनेता तो अभिनेता होता है. काम और अभिनय के मामले में निर्देशक ज्यादा सख्त होते हैं. अब मनमोहन देसाई तो सत्यजित राय की तरह की फिल्में नहीं बना सकते.

Bollywood-Schauspieler Kulbhushan Kharbanda

कुलभूषण खरबंदा ने कई यादगार भूमिकाएं की हैं

इसी तरह किसी राय से मनमोहन जैसी फिल्मों की उम्मीद करना बेकार है." खरबंदा कहते हैं कि एक अभिनेता को पीढ़ियों का यह फर्क समझते हुए अपना किरदार निभाना होता है.

69 साल के इस अभिनेता के लिए कोलकाता कोई नया नहीं है. जाने माने नाट्यकार श्यामानंद जालान की याद में सखराम बाइंडर के मंचन के सिलसिले में कोलकाता आए कुलभूषण बताते हैं, "मैं 1973 में कोलकाता आया था और 1975 में मुंबई जाने के पहले तक यहीं रहा. कोलकाता ने मुझे गोद ले लिया है." उन्होंने अपने मित्र जालान के साथ यहां पदातिक नाम से नाट्य संस्था की स्थापना की और कुछ नाटकों में अभिनय भी किया था. लेकिन मुंबई जाने के बाद वह थिएटर में खास काम नहीं कर सके. अरसे बाद जालान ने जब सखराम बाइंडर का नए सिरे से मंचन शुरू किया तो खरबंदा नब्बे के दशक में इस महानगर में लौटे थे. 1973 में पहली बार इस नाटक का मंचन हुआ था. खरबंदा कहते हैं कि वह एक आलसी व्यक्ति हैं और थिएटर में उनसे अभिनय कराने के लिए श्यामानंद जैसा एक आदमी होना जरूरी था.

खरबंदा को बॉलीवुड में हो रहे बदलाव पसंद हैं. वह कहते हैं, "अब पटकथा बड़े करीने से पुस्तक की शक्ल में मिलती है. पहले तो हमें कहानी पढ़ कर सुनाई जाती थी." खरबंदा किसी का नाम लिए बिना कहते हैं, "कुछ युवा निर्देशक बेहतरीन फिल्में बना रहे हैं. मैंने उनके पिताओं के साथ काम किया है." खरबंदा को फिल्म में अपनी भूमिका छोटी या बड़ी होने के सवाल ने कभी परेशान नहीं किया. वह कहते हैं, "मैं तो हमेशा एक चरित्र अभिनेता रहा हूं."

इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः ए कुमार

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