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दुनिया

'हमारे पास वक्त नहीं है'

ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए जल्द से जल्द कार्बन के उत्सर्जन को कम करना होगा. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो 2030 तक वायुमंडल से कार्बन निकालना होगा.

संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन टीम आईपीसीसी ने कहा है कि सरकारों को अपने देशों में कार्बन उत्सर्जन को कम करना होगा जिससे वैश्विक तापमान में बढ़त को काबू में रखा जा सके. 1000 विशेषज्ञों के साझा अध्ययन में कहा गया है कि अगर उत्सर्जन को काबू में नहीं किया गया तो वैज्ञानिकों को नई तकनीक का इस्तेमाल करके किसी न किसी तरह कार्बन को पर्यावरण से निकालना पड़ेगा. इस तरह की तकनीक विकसित करने में अभी देर लगेगी.

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत

वैज्ञानिकों का कहना है कि जल्द से जल्द प्राकृतिक ईंधन छोड़कर पवन, सौर या परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करना होगा. इससे वैश्विक आर्थक विकास में केवल 0.06 प्रतिशत की कमी आएगी. आईपीसीसी में शामिल जर्मन वैज्ञानिक ऑटमार एडेनहोफर का कहना है कि दुनिया को बचाना बहुत महंगा नहीं पड़ेगा. वहीं, आईपीसीसी के प्रमुख राजेंद्र पचौरी कहते हैं कि दुनिया को बचाने के लिए "हमारे पास वक्त नहीं है." उनके मुताबिक, अगर देशों ने 2030 तक इंतजार किया तो कार्बन को कम करने की भारी कीमत चुकानी होगी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी एक नए स्तर पर लाना होगा.

Weltklimabericht IPCC 2014 Ottmar Edenhofer und Rejendra K. Pachauri

ऑटमार एडेनहोफर और राजेंद्र पचौरी

संयुक्त राष्ट्र में शामिल देशों ने कहा है कि वे वैश्विक तापमान में इजाफे को दो डिग्री तक सीमित रखेंगे. इस तापमान के लिए उन्होंने उद्योग क्रांति से पहले रहे वैश्विक तापमान को मानक बनाया है. अगर बढ़त को सीमित रखा जाए तो इससे बाढ़, सूखे और समुद्रों के बढ़ते स्तर पर काबू रखा जा सकेगा. आईपीसीसी का मानना है कि तापमान को सीमित रखना मुमकिन है लेकिन जिस तरह की पर्यावरण नीतियां अपनाई जा रही हैं, उससे 2100 तक तापमान में लगभग पांच डिग्री की बढ़त आ जाएगी. 18 और 19वीं शताब्दियों में उद्योग क्रांति के बाद से अब तक तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है.

ग्रीनहाउस गैस खत्म करने का तरीका

आईपीसीसी का कहना है कि प्राकृतिक ईंधन के इस्तेमाल से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों को 2050 तक कम करना पड़ेगा ताकि वह 2010 के स्तरों से 40 से 70 फीसदी कम हो जाएं. फिर कोशिश करनी होगी कि 2100 तक उत्सर्जन ना के बराबर हों ताकि तापमान में वृद्धि लगभग शून्य हो जाए. विशेषज्ञों का कहना है कि 2050 तक सीएनजी का इस्तेमाल किया जा सकता है.

Eisbär Eisbären Klimawandel Eisscholle Symbolbild

ध्रुवों पर पिघलती बर्फ

अगर ऐसा नहीं हो पाया तो 2030 तक कार्बन की मात्रा कम करने के उपाय लगाने होंगे. इसका एक तरीका है लकड़ी या फसल जलाकर बिजली पैदा करना और धुएं से निकलने वाले ग्रीनहाउस गैसों को जमीन के नीचे दफना देना. वैज्ञानिकों के मुताबिक पौधों के पैदा होने, उगने और मरने में शामिल कार्बन को कम किया जा सकेगा. लेकिन इस उपाय में फसल को जलाने से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं. साथ ही फसलों को उगाने से जमीन की खपत होगी. आईपीसीसी के पास एक और तरीका है. वैज्ञानिकों की टीम यह भी कहती है कि पेड़ उगाने से फायदा हो सकता है क्योंकि यह ग्रीनहाउस गैसों को अपने अंदर कैद कर सकते हैं.

आईपीसीसी के मुताबिक मनुष्यों के कामों से निकलने वाला उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है लेकिन कुछ और वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रकृति और सूर्य की सतह पर होने वाले बदलाव भी धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी का कारण हो सकते हैं.

एमजी/आईबी (एपी, रॉयटर्स)

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