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ब्लॉग

हमला कोलोन पर नहीं, मेरी आजादी पर हुआ

नए साल पर कोलोन में जो हुआ उसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. अपराधी कोई भी हो, कहीं से भी आया हो, उसे सजा मिलनी जरूरी है. डॉयचे वेले की सारा होफमन का कहना है कि जर्मनी में महिलाओं को निशाना बनने नहीं दिया जा सकता.

मैं अब भी सदमे में हूं. मेरा शहर कोलोन, जिसमें मैं सालों से रह रही हूं और जहां मैंने कभी लड़की होने के नाते खुद को असुरक्षित महसूस नहीं किया था, जहां मैं आधी रात को भी अकेली घूमी हूं, खास कर जब मुझे रेलवे स्टेशन पर गाड़ी बदलनी होती थी, ना तो मेरी जेब में पेपर स्प्रे होता था, ना ही मेरे अंदर किसी तरह का कोई डर. और अब, ठीक यहीं, कोलोन के रेलवे स्टेशन पर न जाने कितनी महिलाओं के साथ बदतमीजी हुई, उनके साथ जबरदस्ती की गयी? वो भी अन्य पुरुष दोस्तों के या फिर परिवार वालों के साथ होते हुए भी? मुझे अब भी इस सब पर विश्वास नहीं हो रहा है.

हालांकि मैं यह बात अच्छी तरह जानती हूं कि म्यूनिख का अक्टूबर फेस्ट या फिर कोलोन का कार्निवाल, उन समारोहों में गिने जाते हैं, जहां ना केवल जेबकतरे घूम रहे होते हैं, बल्कि जहां बार बार महिलाओं के साथ छेड़ छाड़ भी होती है. मैंने भी कभी ना कभी अपनी जांघों पर अनजान हाथों को अनुभव किया है. लेकिन मैं अपना बचाव कर पाई, कभी गाली दे कर, कभी थप्पड़ लगा कर, तो कभी इसलिए क्योंकि दूसरों ने मेरे लिए आवाज उठाई.

Hofmann Sarah

सारा होफमन

लेकिन नए साल की रात जो हुआ, उसका आयाम ही अलग था. जैसा कि कुछ पीड़ितों ने बताया कि मनचले झुंड में आए और अचानक ही उन्हें हर जगह छूने लगे. ऐसे में अगर महिला के साथ कोई हो भी, तब भी वे कुछ नहीं कर सकते. उस रात कितनी महिलाओं के साथ ऐसा हुआ, यह अब तक ठीक से पता नहीं चल पाया है. जर्मनी के सरकारी चैनल की मानें तो शायद सिर्फ 15 ही महिलाओं के साथ छेड़ छाड़ हुई, या फिर शायद और भी बहुत थीं, जिन्होंने शिकायत दर्ज नहीं कराई. कोलोन की पुलिस 150 शिकायतों की बात कर रही है. इनमें से कुछ मामले यौन दुर्व्यवहार के हैं, तो बहुत से चोरी या जेबकतरी के. साथ ही पुलिस का यह भी कहना है कि रेलवे स्टेशन के बाहर स्क्वायर पर करीब 1,000 लोग हल्ला मचा रहे थे, जो बाद में छोटे छोटे झुंड में बंट गए और औरतों के साथ छेड़छाड़ करने लगे. तो यह बात तो साफ है कि औरतों पर किसी एक इंसान ने हमला नहीं किया था. और यह भी कि यह वारदात किसी अंधेरी गली में नहीं, बल्कि चहल पहल वाले रेलवे स्टेशन के अंदर और बाहर हुई है.

इस रात ने मेरी सोच बदल दी

जर्मनी में रहने वाली एक महिला होने के नाते मेरा रवैया हमेशा यह रहा है कि जहां भी लोग दिख रहे हों, वहां मैं खुद को सुरक्षित महसूस करती हूं. खतरा मुझे सिर्फ तब महसूस होता है जब आसपास कोई भी ना हो, जो मेरी मदद के लिए सामने आ सके, जैसे कि किसी अंधेरे ट्राम स्टेशन पर या फिर किसी पार्क में. लेकिन कोलोन के रेलवे स्टेशन पर नहीं. वहां इतने खाने पीने के स्टॉल लगे रहते हैं, सिक्यूरिटी वाले तैनात होते हैं, सीसीटीवी कैमरे हैं, पुलिस है और सबसे बढ़ कर वहां हमेशा लोग होते हैं. लेकिन उस रात ने मेरी सोच ही बदल कर रख दी. जो भीड़ मेरे लिए सुरक्षा का एहसास थी, वही खतरे में तब्दील हो गयी.

भले ही उस रात मैं वहां नहीं थी. लेकिन कोलोन की निवासी होने के नाते, एक जर्मन होने के नाते और सबसे बढ़ कर एक महिला होने के नाते मैं वैसा ही महसूस कर रही हूं, जैसा पीड़ितों ने किया. भले ही यह तुलना अजीब लगे, लेकिन जो हुआ वह किसी आतंकी हमले से कम नहीं था, क्योंकि उस रात मेरी और जर्मनी की हर औरत की आजादी पर वार हुआ था.

हमारे देश में महिलाएं अपनी मर्जी से जहां चाहें जा सकती हैं, जो चाहें पहन सकती हैं. इसलिए कोलोन की मेयर हेनरीटे रेकर ने बचाव के नाम पर जो बयान दिया है कि महिलाओं को अनजान पुरुषों से एक हाथ की दूरी पर रहना चाहिए, वह दुखद है. हमारी माओं और दादियों ने लड़ कर आजादी का यह हक हासिल किया था.

मानव गरिमा अलंघनीय है

और अब जब कार्निवाल में कुछ महिलाएं और लडकियां छोटी स्कर्ट और पतली नेट वाली स्टॉकिंग्स पहनेंगी, तब भी दुनिया के किसी आदमी को कोई हक नहीं कि किसी भी इरादे से वह उनकी जांघ, छाती या टांगों के बीच अपना हाथ ले जाए. और वैसे, यहां यह बता दूं कि नए साल के जश्न में औरतों ने मोटी जैकेट और टोपियां पहन रखी थी. और ये आदमी कोई भी हो, "अरब या उत्तरी अफ्रीका से आया विदेशी जैसा" दिखने वाला या किसी अपराधी गैंग का हिस्सा जो चोरी चकारी के लिए फिर रहा हो या फिर कोई पोशाक पहने इसी इलाके का कोई मनचला जिसने जरूरत से ज्यादा ही पी रखी हो. औरतों के साथ किसी भी तरह की बदतमीजी करना गलत है, सिर्फ बलात्कार ही जुर्म नहीं होता.

अगर जर्मनी आगे भी महिला अधिकार की रक्षा के लिए काम करता रहना चाहता है, तो उसे "जीरो टॉलरेंस" दिखानी होगी. अपराधियों का पता लगा कर उन्हें सजा देनी होगी. अगर हम कोलोन, हैम्बर्ग, श्टुटगार्ट या अपने देश में और कहीं भी इस समस्या का समाधान नहीं निकाल पाए, तो दुनिया के सामने अपनी विश्वसनीयता खो देंगे, खास कर भारत, दक्षिण अफ्रीका और मगरेब में. हमें अपने संविधान की "धारा एक" के एक एक शब्द को संजीदगी से लेना होगा, "मानव गरिमा अलंघनीय है" और ध्यान देना होगा कि कहीं इसमें यह जोड़ने की जरूरत ना पड़ जाए कि यह बात महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बराबरी से लागू होती है.

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