हत्या और मारकाट की संस्कृति | ब्लॉग | DW | 26.06.2015
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ब्लॉग

हत्या और मारकाट की संस्कृति

एक साल से ज्यादा समय से इस्लामिक स्टेट सुर्खियों में है. अब इराक और सीरिया में भावी जिहादी पीढ़ी को ट्रेनिंग दी जा रही है. डॉयचे वेले के कैर्स्टेन क्निप्प का कहना है कि वह मौजूदा समय के मुकाबले ज्यादा बर्बर हो सकता है.

यदि बच्चे भविष्य हैं तो इराक और सीरिया के कुछ हिस्सों में वह अंधकारमय दिखता है. इस तरह की खबरों में तेजी आ रही है कि आतंकवादी संगठन आईएस अनाथालयों से बच्चों का अपहरण कर रहा है और उन्हें लड़ाकू बनने की ट्रेनिंग दे रहा है. बंदियों के बच्चों के अलावा कैद के दौरान पैदा हुए बच्चे भी इस तरह के कैंपों में भेजे जा रहे हैं. वहां उन्हें सलाफी इस्लाम की ट्रेनिंग दी जा रही है और हथियारों से लड़ना सिखाया जा रहा है. ट्रेनर खास तौर पर उन्हें मानसिक रूप से सख्त और व्यवस्थित रूप से बर्बर बनाने पर ध्यान दे रहे हैं. इसकी शुरुआत खुलेआम दी जाने वाली फांसी से होती है जहां बच्चे शुरू में मूक दर्शक होते हैं. बहुत जल्द उन्हें भी इसमें मदद देनी होती है.

अपहृत बच्चों की ट्रेनिंग, उनका मानसिक विनाश और बेरहम प्रशिक्षण साफ दिखाता है कि आईएस में किस तरह के लोग हैं. यह ऐसे लोगों का गिरोह है जो सभी मानवीय सिद्धातों को ठोकर मारते हैं, जिनके लिए अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कोई चाल बहुत बर्बर नहीं, कोई रणनीति मानवविरोधी नहीं.

धर्म का इस्तेमाल

आईएस उस चीज के इस्तेमाल से भी नहीं घबराता जिसे उसने बाहर के लिए अपना सर्वोच्च मूल्य घोषित कर रखा है, यानि धर्म. आईएस की स्थापना करने वाले केंद्रीय लोगों में से एक हाजी बकर उर्फ समीर आबेद अल मुहम्मद अल ख्लाईफावी तानाशाह सद्दाम हुसैन की सेना में कर्नल हुआ करता था. इस्लाम के साथ उसका रिश्ता उदासीनता का था. साथ ही जनवरी 2014 में मारा गया कमांडर एक चतुर रणनीतिकार था और उसे पता था कि वह धर्म का इस्तेमाल अपनी व्यक्तिगत ताकत के लिए कैसे कर सकता है.

दसियों हजार लोगों ने उसकी अपील सुनी, कुछ ने धार्मिक विश्वास की वजह से तो कुछ ने बर्बर पीड़ा का आनंद लेने के लिए: उत्पीड़न, बलात्कार और लोगों की जिंदगी और मौत पर मनमाने फैसले का अधिकार. बर्बर यौनिकता के लिए प्रसिद्ध मारकिस दे सादे अपनी मौत के 200 साल बाद इराक में पुनर्जीवित हो उठा है.

पस्त सेना

जिहादियों के लड़ाकू जोश के बारे में मिल रही खबरें विरोधाभासी हैं. इस तरह की खबरें भी आ रही हैं कि वे मौत से न घबराने वाले उतने भी जांबाज नहीं हैं, जितना अक्सर समझा जाता है. लड़ाई में खुद जाने के बदले वे अपनी कतारों के चरम कट्टरपंथियों को भेज रहे हैं. कुछ समय बाद उनके बच्चों को भी लड़ाई में भेजेंगे जिनका वे इस समय ब्रेनवॉश कर रहे हैं. फिलहाल वे इराक में रहकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं.

इसकी वजह इराक सेना की कमजोरी भी है, जिसकी ताकत वैसी नहीं जैसी अमेरिका की अरबों की मदद से सोची जाती है. खास कर यह सेना पूरी तरह पस्त है. इराक के सुन्नी नरमपंथी उसे शिया कमांडरों के नेतृत्व वाली टुकड़ी समझने लगे हैं जो पूरे देश के हितों का नहीं बल्कि सिर्फ एक धार्मिक समुदाय, शिया समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व करता है. उनके वर्चस्व को वे सेना में सेवा कर और बढ़ाना नहीं चाहते हैं. इसमें ब्रिटेन और अमेरिका के सैनिक प्रशिक्षक भी कुछ नहीं कर सकते, न ही वे लड़ाकू विमान जो आईएस के ठिकानों पर बमबारी करते हैं.

उग्र राष्ट्रवाद को तिलांजलि

दूसरे शब्दों में इस्लामिक स्टेट की चुनौती का सामना सिर्फ राजनीतिक साधनों से किया जा सकता है. आईएस का उत्थान राजनीति की विफलता की वजह से हुआ है. उसका गठन 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद नई राजनीतिक शुरुआत की विफल कोशिश की प्रतिक्रिया में हुआ. शायद ही पहले कभी एक तरफ अत्यंत पेशेवर और पूरी तरह से लैस सेना और दूसरी तरफ राजनीति, सामाजिक और धार्मिक अनभिज्ञता के बीच इतना ज्यादा अंतर रहा है, जितना इराक पर हमले की पृष्ठभूमि में. हो सकता है कि सद्दाम हुसैन का पतन स्वीकार्य था, लेकिन जिस अनाड़ीपन के साथ अमेरिका इराक को फिर से पांवों पर खड़ा करना चाहता था, वह कतई नहीं.

इस अनाड़ीपन ने राक्षस आईएस को जन्म दिया जिसे फौरी तौर पर सैनिक साधनों से लेकिन दूरगामी तौर पर सिर्फ राजनीतिक साधनों से लड़ा जा सकता है. इस राजनीति का आधार इराक के सभी धार्मिक और जातीय समूहों का बराबरी का दर्जा होना चाहिए. यह इस समय के अंध राष्ट्रवाद को देखते हुए मौके पर सक्रिय लोगों के लिए छोटी चुनौती नहीं है. अच्छी बात यह है कि उसकी व्याख्या स्पष्ट है. भावी विकास की कुंजी बगदाद में है, वहां की सरकार और संसद के पास. उन्हीं पर निर्भर करता है कि भविष्य में बच्चों की परवरिश किस तरह से होगी.

ब्लॉग: कैर्स्टेन क्निप/एमजे

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