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दुनिया

हक्कानी नेटवर्क पर यूएन का प्रतिबंध

संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी संगठन हक्कानी नेटवर्क पर पाबंदी लागू किया है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि हक्कानी नेटवर्क अल कायदा से संपर्क रखता है और अफगानिस्तान में आत्मघाती हमलों और अपहरणों के लिए जिम्मेदार है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तालिबान प्रतिबंध समिति ने सारे 193 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों को आदेश दिए हैं कि वे हक्कानी नेटवर्क की संपत्ति को जब्त करें और गुट को हथियार बेचने पर रोक लगाए. हक्कानी नेटवर्क के कमांडर कारी जकीर को खास तौर से ब्लैकलिस्ट किया गया है. अमेरिका ने भी जकीर को ब्लैकलिस्ट कर दिया है.

अफगान सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने में मदद मिलेगी. अफगान आंतरिक मंत्रालय के सादिक सिद्दीकी ने कहा, "कारी जकीर हक्कानी गुट का महत्वपूर्ण सदस्य है. ज्यादातर हमलों के पीछे उसी का हाथ है और वह तालिबान के काफी करीब है. और भी लोगों को इस लिस्ट में शामिल किया जाना चाहिए. पाकिस्तान में जो आतंकवादी हैं उन्हें गिरफ्तार करना होगा."

अमेरिका ने सितंबर में ही हक्कानी नेटवर्क को आंतकवादी गुट घोषित कर दिया था. गुट के कमांडरों के मुताबिक यह इस बात का सबूत था कि अमेरिका अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया को लेकर गंभीर नहीं है. तालिबान ने भी कहा कि प्रतिबंध से कोई फायदा नहीं क्योंकि अमेरिका में उनकी कोई भी संपत्ति नहीं है और वे अमेरिकी नागरिकों से संपर्क नहीं रख रहे थे.

पाकिस्तान को संदेश

लेकिन अफगान ऐनेलिस्ट्स नेटवर्क के थोमास रुटिग का कहना है कि प्रतिबंध एक दूसरे मकसद से लगाए गए हैं, "जाहिर है कि हक्कानी नेटवर्क को संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों और उनकी सरकारों से हथियार नहीं मिलते. पाकिस्तान पर हमेशा आरोप लगते हैं कि वह छिपकर हक्कानी नेटवर्क का सहयोग करता है. हक्कानी नेटवर्क वजीरिस्तान से काम करता है जो पाकिस्तान में है. प्रतिबंध के जरिए संयुक्त राष्ट्र पाकिस्तान को बताना चाहता है कि वह हक्कानी नेटवर्क की करतूतों पर रोक लगाना चाहता है."

हालांकि रुटिग को खुद शक है कि पाकिस्तान हक्कानी को सहयोग देना बंद करेगा. वो कहते हैं कि अफगानिस्तान के "बड़े खेल में वह केवल एक प्यादा हैं." इस्लामाबाद में सरकार अफगानिस्तान से अंतरराष्ट्रीय सेना के हटने के बाद अपने फायदे देख रहा है. वहीं, पाकिस्तान खुद संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध समिति का हिस्सा है और उसका कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र के फैसले का सहयोग करेगा.

जिहाद में साथ

हक्कानी नेटवर्क के सदस्य कई सालों से पाकिस्तान में पनाह पा रहे हैं. उनका मुख्य मकसद है, अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय प्रभाव से निकालना और सत्ता अपने हाथ में ले लेना. गुट प्रमुख जलालुद्दीन हक्कानी 1970 की दशक से ही सक्रिय हो गया थ. उसने उस वक्त सोवियत रूस के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया और 1990 की दशक में तालिबान से मिल गए.

रुटिग के मुताबिक हक्कानी परिवार दक्षिण पूर्वी अफगानिस्तान से है जहां तालिबान कमजोर था. हक्कानी ने फिर तालिबान की मदद की और उसे अफगानिस्तान के उन इलाकों पर कब्जा करने के लिए अपना सहयोग दिया.

रुटिग के मुताबिक हक्कानी तालिबान का ही एक स्वायत्त धड़ा है और वह अकेले भी काम कर सकता है क्योंकि उसके अल कायदा और अरब देशों से संपर्क हैं. तालिबान हक्कानी पर निर्भर है क्योंकि उसके मुकाबले हक्कानी ज्यादा नामी है. वहीं, राजनीतिक विश्लेषक वाहिद मोजदा कहते हैं कि जलालुद्दीन हक्कानी का खुद मानना है कि अगर छोटे छोटे गुट बनने लगे तो वह जिहाद के लिए अच्छा नहीं होगा. इसलिए हक्कानी सदस्य सहित अफगान तालिबान मोहम्मद मुल्लाह ओमर को अपना नेता मानते थे. मोजदा कहते हैं कि अगर तालिबान सत्ता में आता है तो पूर्वी और दक्षिणी अफगानिस्तान में क्षेत्रीय विभाजन की नौबत आ सकती है. हक्कानी नेटवर्क अपने हमलों में तेज और पेशेवर होता जा रहा है. 2008 अप्रैल में अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई पर जानलेवा हमले के पीछे भी उसी का हाथ माना जा रहा है. 2009 दिसंबर में अमेरिकी खुफिया एजेंसी के एक शिविर पर हमला और पिछले साल अमेरिकी दूतावास और अंतरराष्ट्रीय सेना दफ्तर पर हमले के पीछे भी हक्कानी के ही होने की आशंका जताई जा रही है.

रिपोर्टः वसलत हसरत नजीमी/एमजी

संपादनः आभा मोंढे

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