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ब्लॉग

हकीकत से दूर जिस्मफरोशी को कानूनी दर्जा

भारत जैसे परंपरावादी देश में भी अब वैश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की बहस हो रही है. खासकर तब जबकि देश में दक्षिणपंथी विचारधारा की सरकार है. मौजूदा राजनीतिक हालात में यह मकसद दूर की कौड़ी नजर आती है.

भारत में एक तरफ हिंदू कट्टरपंथी संगठन आरएसएस की छत्रछाया वाली मोदी सरकार में जिस्मफरोशी को व्यवसाय घोषित करने की बहस छेड़ना विरोधाभाषी नजर आता है. हाल ही में नियुक्त महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने इसकी मांग कर इसे मुद्दा बना दिया है. इसके बाद हालांकि उनके सुर कुछ नरम जरुर पड़े हैं और उन्होंने साफ किया कि यह उनके निजी विचार है लेकिन वह आठ नवंबर को इस मसले से जुड़े सभी पक्षकारों से बात कर इस बारे में अंतिम फैसले पर पहुंचेगी.

मामले की पृष्ठभूमि

कुमारमंगलम का बयान अनायास नहीं आया है. वह वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की मांग करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समूह की सदस्य हैं. सेक्स वर्कर्स यूनियनों के प्रतिनिधि और कानून एवं समाज विज्ञानियों की मौजूदगी वाले इस समूह को महिला आयोग के साथ मिलकर आगामी आठ नवंबर से इस मसले पर कोई आमराय कायम कर सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराना है. इस बीच उनकी तैनाती महिला आयोग की अध्यक्ष के तौर पर होने के बाद अब इस मामले में उनकी भूमिका अहम हो गई है.

मौजूदा स्थिति यह है कि भारत में अनैतिक व्यापार निषेध कानून 1956 के तहत वेश्यावृत्ति अपराध है. भले ही इस पेशे में महिला अपनी मर्जी से आई हो या जबरन धकेली गई हो. सच्चाई यह है कि बहस का मुद्दा जिस्मफरोशी को अपराध घोषित करना या नहीं करना मात्र नहीं है. बल्कि मौजूदा कानून की तमाम कमजोर पक्षों के कारण समस्या का समाधान के बजाय विकराल होता जाना बहस का मूल विषय है.

जिस्मफरोशी करते हुए पकड़े जाने पर यह कानून महिला और पुरुष के साथ अलग अलग तरीके से पेश आता है. दरअसल इस कानून के तहत यह साबित कर पाना बड़ा कठिन है कि कोई पुरुष अपनी मर्जी से जिस्मफरोशी कर रही महिला के पास आया था या महिला को जबरन उसके पास भेजा गया था. इस कारण से वादी और प्रतिवादी पुलिस के रहमोकरम पर आ जाते हैं. यहीं से इस धंधे में भ्रष्टतंत्र की आमद होने के साथ ही यह कानून पुलिस और वकीलों की कठपुतली बनकर रह जाता है.

समाधान

सुप्रीम कोर्ट ने कुमारमंगलम की सदस्यता वाले पैनल को मौजूदा कानून की कमजोर कडि़यों को खोजने और इनका समाधान बताने को कहा है. इसमें से एक विकल्प वेश्यावृत्ति को अपराध की श्रेणी से बाहर करना भी शामिल है. कुमारमंगलम खुद इसे कानूनी घोषित करने की हिमायती हैं. आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 50 लाख महिलाएं जाने अनजाने और चाहे अनचाहे इस पेशे में हैं. यह बात दीगर है कि भारत में अधिकांश महिलाएं जबरन इस धंधे में धकेली गई हैं. इसलिए पश्चिमी देशों की तर्ज पर जिस्मफरोशी को कानूनी बनाना समझदारी नहीं होगी.

सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास में लगे देशव्यापी संगठन पतिता उद्धार सभा के संयोजक खैराती लाल भोला का कहना है कि यह कदम तब कारगर हो सकता है जहां महिलाएं अपनी मर्जी से इस पेशे को अपनाती हों. इससे पुलिसराज से निजात मिलती है और सेक्स वर्कर अपनी कमाई से अर्थव्यवस्था में भी योगदान कर सकती हैं. मगर भारत में वेश्याओं के हिस्से की कमाई दलालों और पुलिस के हाथ लगती है जबकि महिला को नारकीय जीवन ही नसीब में आता है.

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