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दुनिया

हंगामा मचाया लेस्बियन विज्ञापन ने

समलैंगिकता बहुत से समाजों में अभी भी वर्जित है और मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों के बावजूद उसे बहुत से देशों में अपराध की श्रेणी में रखा जा रहा है.

समलैंगिकता बहुत से समाजों में अभी भी वर्जित है और मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों के बावजूद उसे बहुत से देशों में अपराध की श्रेणी में रखा जा रहा है. सामाजिक भेदभाव के अलावा समलैंगिक और ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी लैंगिक पसंद और पहचान के कारण कानूनी भेदभाव, हिंसा, उत्पीड़न और मौत का भी सामना करना पड़ता है.

संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार 2011 में समलैंगिकों के मानवाधिकारों की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की थी. महासचिव बान की मून का कहना है कि उनकी पीढ़ी में भी इसे संवेदनशील मुद्दा माना जाता था, लेकिन उन्होंने बोलना सीखा है क्योंकि लोगों की जानें दाव पर हैं. वहीं उनके संगठन के बहुत से देश अभी भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. भारत में एलजीबीटी समुदाय को समाज में बराबरी का दर्जा दिलवाने के प्रयास होते रहे हैं. कभी इनमें सफलता मिली है तो कभी नाकामी, लेकिन विज्ञापन जगत की ताजा पहल बोल्ड इज ब्यूटीफुल इस मुद्दे को व्यापक आयाम दे रही है. इसमें एक लेस्बियन जोड़े को माता-पिता से मिलने जाने की तैयारी करते दिखाया गया है. फर्स्टपोस्ट ने इस वीडियो को पोस्ट कर कहा कि फैशन ब्रांड का विज्ञापन वायरल हो गया है.

मीडिया में इस एड फिल्म की काफी चर्चा और सराहना हो रही है. हिंदुस्तान टाइम्स ने ई-कॉमर्स कंपनी मिन्त्रा के विज्ञापन को सुंदर और दिल को छूने वाला बताया है.

दैनिक डीएनए का कहना है कि लेस्बियन जोड़े वाला विज्ञापन भारत के लिए सशक्त संदेश देता है, जहां समलैंगिक सेक्स पर पाबंदी है.

डेली भास्कर ने भी मिन्त्रा के विज्ञापन को कमाल का बताया है.

समर हालर्नकर का कहना है कि यह पहला लेस्बियन विज्ञापन नहीं है. फास्ट ट्रैक ने दो साल पहले लेस्बियन जोड़े के साथ एक विज्ञापन बनाया था, लेकिन उसे उतनी ख्याति नहीं मिली और न ही वह वायरल हुआ.

बोल्ड इज ब्यूटीफुल पर भारत में बहस हो ही रही है, दुनिया भर में भारत की इस एड फिल्म पर टिप्पणी की जा रही है. जेसिका गुडएनफ ने ट्वीट किया है कि मिन्त्रा का विज्ञापन भारत की सहिष्णुता की परीक्षा है.

अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने फिल्म द विजिट को सभ्य, कलात्मक और महत्वपूर्ण बताया है.

इस 3 मिनट के विज्ञापन के प्रभाव को कुछ लोग आशंका और अविश्वास से भी देख रहे हैं. इसे बहुत सफल ना मानने वालों की भी कमी नहीं.

सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहुत उत्साह है, लेकिन देखना होगा कि यह भारत के नीति निर्माताओं को कब प्रभावित कर पाएगा.

एमजे/आरआर

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