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विज्ञान

स्वीमिंग पूल में बजेगा वायलिन

क्या आप पानी के अंदर वायलिन बजाने की कल्पना कर सकते हैं? अब तक यह संभव नहीं था. लेकिन कार्बन फाइबर से बना वायलिन पानी के नीचे भी वैसी ही धुन छेड़ता है, यानी वायलिन ले कर आप स्वीमिंग करने भी जा सकते हैं.

मौसम और संगीत का एक खास रिश्ता होता है. बारिश की बूंदों की टपटप के बीच वायलिन की धुनों का अपना ही मजा है. लेकिन बारिश में भीगते हुए वायलिन नहीं बजाया जा सकता, ऐसा किया तो लकड़ी फूल जाएगी और वायलिन हमेशा के लिए शांत हो जाएगा. लेकिन अगर वायलिन किसी और चीज का बना हो, जिससे धुनें भी वैसी ही निकलें तो समाधान हो सकता है. इसीलिए अब नई तकनीक से कार्बन फाइबर के वायलिन बनाए जा रहे हैं, जिन्हें पानी के अंदर भी रखा जाए, तो वे खराब नहीं होते.

खूबसूरत और किफायती

2012 में पहली बार कार्बन फाइबर वाला वायलिन बाजार में आया. इसे बनाने वाले योर्ग क्लाइनलश्टेडे कुछ नया करना चाहते थे, "हम कुछ ऐसा करना चाहते थे जो युवाओं को भी पसंद आए और मंझे हुए संगीतकारों को भी. पहले फाइबर ग्लास की इलेक्ट्रिक वायलिन बनाने के बारे में सोचा, लेकिन फिर इस मटेरियल पर ध्यान गया, जो अकूस्टिक के लिहाज से बेहतरीन है."

कार्बन फाइबर आम तौर पर कार और हवाई जहाज बनाने में काम आता है. अब इससे वायलिन बन रहा है. कटाई छटाई से वायलिन तैयार होने तक में दस दिन लगते हैं और फिर तैयार होता है चमकदार ब्लैक वायलिन. लकड़ी का पारंपरिक वायलिन 5,000 यूरो यानी करीब तीन लाख का होता है, लेकिन कार्बन फाइबर वाला सवा लाख में ही मिल जाता है. यह आम वायलिन की तुलना में काफी हल्का भी है.

कचरे का निपटारा

बरसात में यहां वहां उग आने वाली काई को अक्सर गंदगी से जोड़ा जाता है, लेकिन यह गंदगी साफ कर सकती है. दूसरे पौधों की तरह काई भी कार्बन डाई ऑक्साइड सोखती है. जर्मनी में ऐसी रिसर्च चल रही है, जिससे काई के जरिए आबोहवा में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा को कम किया जा सकता है और यह पेट्रोल का विकल्प बन कर भी उभर सकती है. मंथन के इस एपिसोड में इस रिसर्च पर विस्तार से रिपोर्ट पेश की गई है. इसके अलावा पर्यावरण को बचाने के लिए कचरे के सही निपटारे की जरूरत पर भी एक रिपोर्ट शामिल की गई है. आम तौर पर कचरे को एक साथ मिला कर जला दिया जाता है. लेकिन सभी तरह के कूड़े को साथ में जलाना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. मंथन में इस बार आप जानेंगे कि किस तरह से सही ढंग से कूड़ा ठिकाने लगाने से बिजली भी बन सकती है और सड़कें भी.

मंथन में इस बार खास नजर होगी 20,000 यूरो के एक कैमरे पर. जानेंगे 100 साल पुराने लेकिन शानदार लाइका कैमरों की खासियत और स्मार्टफोन और टैबलेट के लिए बन रहे विज्ञापनों की तकनीक. इस सब के साथ साथ विज्ञान जगत की और भी ढेर सारी जानकारी के लिए देखना ना भूलें मंथन शनिवार सुबह 10.30 बजे डीडी1 पर और पहुंचाएं हम तक अपनी प्रतिक्रियाएं.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

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