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दुनिया

"स्वाभाविक रहे यूरोप में शांति"

जर्मन विदेश मंत्री फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर ने कहा है कि जर्मनी विदेश नीति का लक्ष्य यूरोप में शांति बनाए रखना है. डॉयचे वेले के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि यूरोप की सुरक्षा संरचना पर फिर से सोचना होगा.

पेश है डॉयचे वेले के डागमार एंगेल के साथ जर्मनी के विदेश मंत्री फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर की बातचीत.

डागमार एंगेलः रविवार को यूक्रेन में नया राष्ट्रपति चुना जाएगा. क्या आप आश्वस्त हैं?

फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर: हर हाल में हमने उसके लिए तैयारी की है. जब मैं 'हम' बोल रहा हूं तो मेरा मतलब सिर्फ जर्मनों से नहीं है, बल्कि बहुत से दूसरों के साथ मिलकर. इस चुनाव को संभव बनाने में यूरोपीय सुरक्षा और सहयोग संगठन की बड़ी भूमिका है. मुझे उम्मीद है अधिकतर यूक्रेनवासियों को, पूर्वी यूक्रेन में भी, मतदान में भाग लेने का मौका मिलेगा. और मुझे उम्मीद है कि इस हफ्ते डोनेस्क में एक और गोल मेज सम्मेलन होगा ताकि वहां यह समझ बन सके कि चुनाव ही नई वैधता कायम कर सकता है. और अंत में एक राष्ट्रपति चुना जाए, जिसे देश के पूरब में भी मान्यता मिले.

क्या यह सचमुच एक मोड़ साबित हो सकता है?

मैं कहता हूं कि यह हर हाल में सुई की छेद जैसा है. हम फिलहाल ऐसी हालत में हैं कि कीव में एक नई सरकार, एक नया नेतृत्व है, जिसका चुनाव संसद ने किया है, जिसकी वैधता पर पूर्वी यूक्रेन में सवाल उठाए जा रहे हैं और खास कर आलोचकों से हम हमेशा कहते हैं, यदि आप आलोचना कर रहे हो, तो आपकी इसमें बड़ी दिलचस्पी होनी चाहिए कि राष्ट्रपति के चुनाव के साथ एक नई कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत हो, जो तब और कदमों के जरिए संवैधानिक सुधारों और संभवतः इस साल के दौरान संसदीय चुनाव के साथ जारी रखा जा सके.

Deutschland Deutsche Welle Review 2014 DW-Interview mit Frank Walter Steinmeier

डॉयचे वेले के साथ इंटरव्यू में श्टाइनमायर

क्या कोई लक्ष्मण रेखा जैसा कोई विचार है, जब अगली बार फिर से प्रतिबंधों की धमकी दी जा सकती है?

इसका पता हमें रोजमर्रा में चलेगा. फिलहाल मैं उसके बारे में नियमित रूप से नहीं सोचता. मैं इस पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं कि रविवार को ये चुनाव संभव हों और उसमें अधिक से अधिक लोग भाग लें. और तब समस्याओं का हल नहीं हो जाएगा, और समस्याएं हमारे सामने होंगी, खास कर राजनीतिक, जैसा कि मैंने बताया है, नए संविधान का निर्माण, जब इस बात पर बहस और शायद झगड़ा होगा कि भविष्य में देश का नेतृत्व कितना विकेंद्रित होगा. भावी संविधान में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच शक्ति संतुलन कैसा होगा. लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती देश की आर्थिक स्थिरता लाने की होगी, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष से लेकर एक नए भ्रष्टाचार विरोधी कानून को पास करने और जो उससे भी महत्वपूर्ण है, एक स्वतंत्र जांच ब्यूरो बनाने तक - जो किसी सरकार पर निर्भर न हो, एकल व्यक्तियों पर तो कतई नहीं ताकि यूक्रेन की कई बुराइयों के जड़ को मिटाया जा सके. इसके अलावा आर्थिक मदद पहुंचाना होगा, उन्हें बेहतर राजनीति में बदलना होगा. और ये सब यूक्रेनियों के लिए भी बड़ी चुनौती है. लेकिन साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी. हर हाल में उन लोगों के लिए जिनकी दिलचस्पी इस बात में है कि यूक्रेन में स्थिरता आए.

आपने कहा कि पिछले हफ्तों और महीनों में आप हर दिन 24 घंटे इस विवाद में उलझे रहे हैं. आपने यहां वहां का दौरा किया है, हर किसी के साथ आपकी तस्वीर देखी जा सकती है, आप लगातार बोल रहे हैं. साथ ही दबाव बढ़ रहा है जो टकराव के तर्क पर आधारित है, जो कहता है, हमें अपना रक्षा बजट बढ़ाना चाहिए, हमें शक्ति संतुलन कायम करना चाहिए. आप इसके साथ कैसे पेश आते हैं?

मैं इसके पक्ष में हूं कि हम उन साधनों का इस्तेमाल करें, जो सचमुच हमारे पास हैं. लेकिन विदेश नीति और कूटनीति की गलतियों में यह भी शामिल है कि हम उसे बढ़ा कर आंकते हैं. मैं समझता हूं कि अंत में यह होगा कि यदि हमें यूक्रेन के मौजूदा संकट को निबटाने में कामयाबी मिलती है तो लोग आसानी से 80 के दशक में वापस नहीं लौट पाएंगे और कह पाएंगे कि यूक्रेन के अनुभव से हमें कसे हुए बजट के बावजूद थोड़ा शस्त्रीकरण करना चाहिए. आगे पढ़िए..

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