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ब्लॉग

स्मृतियों का दिन

70 साल पहले जर्मन सेना के आत्मसमर्पण के साथ यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुआ. युद्ध की तबाही से निकलकर यहां तक पहुंचने में जर्मनी ने लंबा रास्ता तय किया है. प्रमुख संपादक अलेक्जांडर कुदाशेफ की राय.

8 मई 1945. यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ. 6.5 करोड़ लोग मारे जा चुके थे. युद्ध में जर्मनी की हार हुई लेकिन कई जर्मन खुश थे कि आखिकार छह साल बाद युद्ध व पिताओं, भाइयों और बेटों की मौत का सिलसिला खत्म हुआ. तबाह हो चुके शहरों के बाशिंदे कई सालों तक हुई हवाई बमबारी के बाद राहत की सांस ले सकते थे.

लेकिन ज्यादातर जर्मनों ने आठ मई को हार का दिन माना, खास तौर पर युद्धबंदी सैनिकों ने. वे जानना चाहते थे कि अब उनके साथ क्या होगा. कुछ को जल्द ही रिहा कर दिया गया लेकिन बाकियों ने सोवियत लेबर कैंप में 10 साल तक का वक्त गुजारा. अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, पोलैंड, नीदरलैंड्स, कनाडा, बेल्जियम और सोवियत संघ का गठबंधन, उस दिन को बिना शर्त आत्मसमर्पण करवाने के लिए याद करते हैं. विजय का दिन.

इनके अलावा तृतीय राइष के पीड़ित भी हैं: यहूदी, समलैंगिक, जिप्सी, कम्युनिस्ट, सोशल डेमोक्रैट, उदारवादी और हिटलर के खुले और छुपे शत्रु. उनके लिए 8 मई 1945 मुक्ति का दिन है, यातना शिविरों से, जेलों से और छुप छुपकर जीने से मुक्ति का दिन.

बड़ा बदलाव

8 मई 1945 को पहली बार जर्मन राष्ट्रपति रिचर्ड फॉन वाइत्सेकर ने वो बात कही, जिसे ज्यादातर लोग महसूस कर रहे थे. 8 मई भले ही हार का दिन हो लेकिन निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो वो मुक्ति का दिन था. जर्मन भले ही चाहते थे या नहीं, लेकिन उन्हें नाजी तानाशाही से, अडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी से, यहूदियों के हत्याओं के डर से और आतंक से आजादी मिली. युद्ध ने सीमा पर और यातना शिविरों में नरसंहार रोक दिया.

जर्मनी हारा लेकिन कुछ सालों के भीतर ही इसे हिटलर शासन के भयावह आतंक से बाहर निकलकर आजादी और लोकतांत्रिक ढंग से जीने का मौका मिला. कम से कम पश्चिम जर्मनी को. पूर्वी हिस्से में जर्मन डेमोक्रैटिक रिपब्लिक की स्थापना हुई. यह सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट सैटेलाइट जैसा था, जहां लोकतांत्रिक अधिकार और आजादी नहीं थी. यह 40 साल तक चला और बर्लिन की दीवार के गिरने का साथ ही अक्टूबर 1990 में जर्मन एकीकरण संभव हुआ.

नया आत्मविश्वास

8 मई 2015 यानी युद्ध खत्म होने के 70 साल बाद, आज एकीकृत जर्मनी दुनिया में सबसे ज्यादा सम्मान से देखे जाने वाले देशों में से एक है. अपने लोकतंत्र व सामाजिक रुख के साथ वह आर्थिक रूप से सफल समाज है. और एक दशक में वह यह भी देख रहा है कि उससे यूरोप का नेतृत्व करने और दुनिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है. कभी कभी सैन्य रूप से, लेकिन मुख्य रूप से राजनैतिक और आर्थिक तौर पर.

जर्मनी शेखी बघारने वाला नहीं है लेकिन उसका आत्मविश्वास बढ़ रहा है. इसके लिए उसकी आलोचना भी होती है जो सहमति की कोशिश करने वाले जर्मनों को तकलीफ पहुंचाती है. लेकिन वे इसके साथ जीना सीख जाएंगे.

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