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मंथन

स्मार्टफोन की लत का इलाज

क्या स्मार्टफोन की लत लग जाती है. हम हमेशा टच में रहना चाहते हैं. कभी फेसबुक अपडेट तो कभी इमेल चेकिंग या गेम्स.

बॉन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक मिनिप्रोग्राम बनाया है जिससे पता लगाया जा सकता है कि लोग फोन का कितना इस्तेमाल कर रहे हैं. मेंटल नाम का फ्री ऐप मोबाइल यूजर को उसकी स्मार्टफोन लत के बारे में जागरूक करता है.

इस प्रोग्राम के बारे में कंप्यूटर विज्ञानी अलेक्सांडर मार्कोवेत्स बताते हैं, "ऐप मोबाइल में छोटे इवेंट सेव कर लेता है, कि कब मोबाइल या कब ऐप ऑऩ हुए. फिर ये एक सर्वर पर आता है जहां हम आंकते हैं कि कितनी बार, कितनी देर मोबाइल इस्तेमाल किया गया और कितने ऐप यूज हुए. ये जानकारी यूजरों को भेजी जाती है. जो फिर खुद सब विस्तार से देख सकता है."

डराने वाले नतीजे

यह ऐप एक शोध का हिस्सा भी है जो एक लाख से ज्यादा लोगों के मोबाइल इस्तेमाल करने की आदतों को आंक रहा है. सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने वाले लोगों के आंकड़े रिसर्चर अपने सर्वर पर देखते हैं. पहले नतीजे डराने वाले हैं. मार्कोवेत्स के मुताबिक, "एक दिन में तीन घंटे और वह भी थोड़ी थोड़ी देर, कुल एक सौ तीस इंटरेक्शन. यानि कुल एक सौ तीस बार फोन अनलॉक किया, हर साढ़े सात मिनट में एक बार व्यक्ति मोबाइल देखने लिए ब्रेक लेता है."

ऐसे में काम पर ध्यान देना मुश्किल है. काम गुणवत्ता पर असर पड़ता है क्योंकि ध्यान बार बार मोबाइल में होता है. आदत पड़ने का खतरा है. वैसे अभी मोबाइल की लत कोई औपचारिक शब्द नहीं. लेकिन मोबाइल ज्यादा यूज करने में लत लगने की संभावना है. मनोचिकित्सक क्रिस्टियान मोनटाग बताते हैं, "नशीली चीज के प्रति टॉलरेंस बढ़ता है. आप इस चीज का लगातार इस्तेमाल करते रहते हैं ताकि वही संतुष्टि महसूस हो. आज एक घंटा क्योंकि आईफोन बहुत अच्छा लगा, कल शायद दो तीन घंटे. नहीं इस्तेमाल करने पर तलब होती है. टेलीफोन घर पर भूल गए तो वो वापिस जाते हैं वो परेशान हो जाते हैं कि हे भगवान आज दोस्तों से बात नहीं हो सकेगी और फेसबुक अपडेट भी नहीं देख सकेंगे."

सभी नशे के मामलों में सवाल ये होता है कि लत कितनी गंभीर है. सेल टेस्ट से रिसर्चर वो जेनेटिक संकेत खोजना चाहते हैं जो दूसरे नशे से जुड़े हुए हों. मोनटाग ने बताया, "हमने पाया कि एक जीन वेरिएशन सिगरेट पीने से जुड़ा है और इंटरनेट की लत से भी. तो इसी तरह के बायोकेमिकल बेस हमें अलग अलग लतों से जुड़े हुए मिलते हैं."

बीमारी है मोबाइल की लत

यह इस बात का संकेत है कि मोबाइल की लत भी बाकी नशों की तरह बीमारी मानी जाए और उसका इलाज किया जाए. मोबाइल के अति इस्तेमाल से दिमाग पर बुरा असर होता है. अलेक्सांडर मार्कोवेत्स विस्तार से बताते हैं, "अभी हम जो मोबाइल के साथ कर रहे हैं वह योग के बिलकुल विपरीत है, हम खुद को एक विचित्र पोज में ले जाते हैं और कोशिश करते कि खुद का ध्यान तेजी से भटकाते हैं. इससे मेरे दिमाग पर तुरंत असर नहीं पड़ता लेकिन जब में हर दिन तीन घंटे कई साल ये करता हूं तो कुछ तो असर पड़ेगा ही और निश्चित ही कोई अच्छा नहीं ही पड़ेगा."

तो जिसे डिजिटल डाइटिंग करनी हो उसके लिए मार्कोवेत्स की ये टिप्स हैं, "पहला नियम, सोफे पर लेटे लेटे फोन क्लिक नहीं करना है, इसे हम डेड जोन कहते हैं. या तो मैं वो एरिया कम कर दूं जिसमें मैं मोबाइल इस्तेमाल कर सकता हूं. या फिर मैं अपने मोबाइल को समय में बांध दूं. फिर मैं तय करूंगा कि सात दिन बाद या फिर सप्ताह में एक दिन बिलकुल फोन नहीं यूज़ करूंगा. एक और सलाह, एक कलाई घड़ी जरूर खरीद लें. इससे कम से कम टाइम देखने के लिए मोबाइल की जरूरत नहीं पड़ेगी और पहले ऐप का इस्तेमाल भी बच जाएगा. कुल मिला कर बड़ी मदद."

स्मार्टफोन यूजर अब मेंटल ऐप से खुद ही देख सकते हैं कि उनका मोबाइल फोन यूज़ खतरे की लकीर तक तो नहीं पहुंच गया.

रिपोर्टः मार्टिन रीबे/एएम

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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