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दुनिया

स्मार्टफोन का शिकार बनती भावी पीढ़ी

भारतीय स्कूली बच्चों की इंटरनेट और स्मार्टफोन तक आसान पहुंच के कारण उनका ऑनलाइन पीछा करने यानी स्टॉकिंग और साइबर बुलिंग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. केवल कोलकाता में ही 2011 से 2015 के बीच इसमें 255.8 फीसदी की वृद्धि.

भारत के हर दो में से एक स्कूली बच्चा कभी न कभी इंटरनेट पर साइबर स्टॉकिंग का शिकार होता है. एक निजी संस्था यूनीनोर की ओर से हाल में किए गए इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश भर के औसतन आधे स्कूली छात्र इसकी चपेट में हैं. विभिन्न साइबर थानों और साइबर क्राइम सेल में दर्ज होने वाले मामलों की तादाद इसकी पुष्टि करती है. कोलकाता पुलिस की साइबर सेल के एक अधिकारी कहते हैं, "वर्ष 2012 तक मुश्किल से ऐसे चार-पांच मामले सामने आए थे. लेकिन अब हर महीने पांच से दस शिकायतें मिल रही हैं. हर मामले में पीड़ित या शोषण करने वाला छात्र ही है."

उक्त सर्वेक्षण में देश भर के 29 स्कूलों के दस हजार से ज्यादा छात्रों को शामिल किया गया था. सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी कि नियमित रूप से इंटरनेट तक पहुंच रखने वाले छात्रों में से 30 फीसदी को कभी न कभी साइबर बुलिंग, साइबर स्टॉकिंग या हैकिंग का शिकार होना पड़ा था. इनमें से महज 34 फीसदी छात्रों ने ही अपनी ऑनलाइन गतिविधियों के बारे में अपने अभिभावकों को बताया था. इससे पहले बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2017 यानी अगले साल तक भारत के 13.4 करोड़ बच्चे इंटरनेट पर सक्रिय हो जाएंगे. वर्ष 2012 में यह तादाद 3.95 करोड़ थी.

वजह

समाजशास्त्रियों का कहना है कि संयुक्त परिवारों में बिखराव व एकल परिवारों की बढ़ती तादाद के अलावा स्मार्टफोन और इंटरनेट तक आसान पहुंच इसकी सबसे बड़ी वजह है. एक पुलिस अधिकारी जी.के. अस्थाना बताते हैं, "स्मार्टफोन क्रांति की वजह से ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. कंप्यूटर की तरह मोबाइल फोनों में लॉग-इन और लॉग-आफ की कोई व्यवस्था नहीं है. नतीजतन स्मार्टफोन वाले छात्र चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहते हैं. अपराधी ऐसे छात्रों में से ही अपने शिकार चुनते हैं." साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि वायरलेस तकनीक से फाइल ट्रांसफर की तकनीक आसानी से उपलब्ध होने की वजह से मामूली लापरवाही से भी फोन में दर्ज सूचनाएं सार्वजनिक हो सकती हैं. अपराधी इसी का फायदा उठा कर संबंधित छात्रों को ब्लैकमेल करते हैं और कई मामलों में उनका यौन शोषण भी होता है.

समाजशास्त्र के प्रोफेसर नरेन डेका कहते हैं, "समाज में एकल परिवारों की बढ़ती तादाद इसकी एक बड़ी वजह है. कामकाजी दंपत्ति अपनी कमी पाटने के लिए कम उम्र में ही बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन थमा देते हैं. एक बार उसमें इंटरनेट भरने के बाद वह बच्चा अपराधियों के लिए आसान शिकार बन सकता है." वह कहते हैं कि ज्यादातर अभिभावकों के पास यह देखने का भी समय नहीं होता कि उनका बच्चा स्मार्टफोन और इंटरनेट के जरिए क्या कर रहा है. साइबर अपराधी इसका फायदा उठाने से नहीं चूकते. बाल मनोवैज्ञानिक डॉक्टर रमोला भट्टाचार्य कहती हैं, "हाल में अपने बच्चे के व्यवहार में बदलाव की शिकायत के साथ आने वाले अभिभावकों की तादाद बढ़ी है. ऐसे मामलों की जांच से यह तथ्य सामने आया है कि वह बच्चे सोशल मीडिया पर अपना काफी समय बिताते थे और उनको इंटरनेट की लत लग चुकी थी." वह बताती हैं कि पहले ऐसे मामले देखने को नहीं मिलते थे.

अंकुशकेउपाय

विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ती इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए छात्रों के साथ ही अभिभावकों को भी जागरूक बनाना जरूरी है. झारखंड में पुलिस ने नौवीं से 12वीं कक्षा तक के छात्रों के बीच जागरुकता अभियान शुरू किया है. लेकिन समाजशास्त्री नरेन डेका कहते हैं कि इसके लिए पूरे देश में संगठित तौर पर अभियान चलाना जरूरी है. इसके लिए गैर-सरकारी संगठनों के अलावा टेलीकॉम और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को भी साथ लेना जरूरी है. साइबर क्राइम सेल की ओर से खासकर छात्रों को समय-समय पर पासवर्ड बदलने और किसी अजबनी से दोस्ती नहीं करने की सलाह दी जाती है. लेकिन यह सलाह छात्रों के सिर के ऊपर से ही गुजर जाती है. एक पुलिस अधिकारी कहते हैं कि ऐसे ज्यादातर मामलों में लड़कियां ही शिकार होती हैं. कई मामलों में संदिग्ध अपराधी भी नाबालिग होते हैं जो मामूली सी बात पर भी बदला लेने के लिए लड़कियों को अपना शिकार बना लेते हैं. हाल में सामने आए ऐसे कई मामलों में अपराधी किशोरों को काउंसेलिंग के लिए भेजा गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते इस समस्या पर अंकुश लगाने के उपाय नहीं किए गए तो देश की भावी पीढ़ी धीरे-धीरे बर्बादी की कगार पर पहुंच जाएगी. उनका कहना है कि स्मार्टफोनों और इंटरनेट की पहुंच पर तो अंकुश लगाना संभव नहीं है. लेकिन किशोरों और उनके अभिभावकों को ऑनलाइन खतरे के बारे में आगाह कर इस पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. कानून विशेषज्ञों की राय में साठ फीसदी लोगों को साइबर अपराध की खास जानकारी नहीं है. नतीजतन ऐसे कई मामलों की शिकायत ही दर्ज नहीं कराई जाती. उनको बताना होगा कि साइबर बुलिंग या स्टॉकिंग सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है. ज्यादातर मामलों में पीड़ित व अपराधी दोनों इस बात से अनजान होते हैं. इसके लिए खासकर स्कूलों में बड़े पैमाने पर संगठित अभियान चलाना जरूरी है.

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