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मनोरंजन

स्पेस से खेलने का आनंद कुछ और है

भानु भारती की गणना देश के प्रमुख रंगकर्मियों में होती है. उनकी रंगशैली में लोकनाट्य के तत्व तो हैं ही, उसमें उन्होंने सामुदायिक जीवन और उसमें होने वाले कर्मकांड को भी शामिल किया है.

पिछले वर्ष भानु भारती ने गिरीश कर्नाड के प्रसिद्ध नाटक ‘तुगलक' का मंचन दिल्ली में फिरोजशाह कोटला के ऐतिहासिक खंडहरों के बीच करके नाट्यजगत में धूम मचा दी थी और उसे देखने चार दिन तक तीन हजार से अधिक दर्शक आते रहे थे. इसमें फिल्म जगत के जाने-माने कलाकार यशपाल शर्मा और हिमानी शिवपुरी ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई. भानु भारती द्वारा निर्देशित अनेक नाटक मसलन ‘कथा कही एक जले पेड़ ने', ‘चंद्रमा सिंह उर्फ चमकू', ‘अक्स तमाशा' और ‘तुगलक' हिन्दी रंगमंच की यात्रा में मील के पत्थर माने जाते हैं. 'कथा कही एक जले पेड़ ने' तो लिखा भी उन्हीं ने था. उन्होंने अपनी रंगशैली में लोकनाट्य के तत्वों का समावेश भी किया है और भीलों की गवारी शैली में मंचित उनके नाटकों 'काल कथा', 'अमरबीज' और 'पशु गायत्री' ने एक नया इतिहास रचा है. प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश:

रंगमंच की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ? क्या बड़े भाई मशहूर नाट्यनिदेशक मोहन महर्षि के कारण?

शुरुआत तो वैसे ही हुई जैसे सबकी होती है. बचपन में पलंग खड़ा करके और उस पर चादर डालकर स्टेज बनाया करते थे, छोटे-छोटे कागज के टुकड़ों पर लिखकर टिकट बनाए जाते थे और घर वालों और मुहल्ले-पड़ोस वालों को चार-चार आने में बेचे जाते थे. नाटक भी लिखे जाते थे, शायद उन कहानियों के आधार पर जो हमें मां, दादी या नानी से सुनने को मिलती थीं. ये नाटक घरवालों को, और अगर मेहमान आए हुए हैं तो उन्हें भी देखने पड़ते थे. औरों की प्रतिक्रिया कुछ भी रही हो, लेकिन मां हमेशा बहुत प्रोत्साहित करती थीं. कुछ बड़ा हुआ तो तुकबंदी करने लगा और जयपुर के हिन्दी दैनिक 'राष्ट्रदूत' के 'बच्चों की दुनिया' वाले खंड में इस तरह की कुछ कविताएं छपीं भी. पिताजी के जोर देने पर एक साल कृषि विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई भी की लेकिन दिल नहीं लगा तो छोड़ कर जयपुर में बी.ए. में दाखिला लिया. तब तक मैं गीत लिखने लगा था, कवि सम्मेलनों में जाता था और 17-18 वर्ष की उम्र में ही युवा कवि के रूप में मशहूर हो गया था. मैं इसी दौर में छात्र राजनीति में भी सक्रिय हुआ और छात्रनेता के रूप में जाना जाने लगा. इसी समय मैंने हिन्दी साहित्य, विश्व साहित्य और साहित्यिक आलोचना का गंभीरता से अध्ययन करना शुरू किया. 1969 तक आते-आते दुनिया भर में छात्र आंदोलन भी बिखरने लगा था. बड़े भाई मोहन महर्षि दिल्ली दूरदर्शन में आ गए थे. तब मैंने भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में इंटरव्यू दिया और 1970 में दिल्ली आ गया.

आपके साथ कौन-कौन थे?

मेरी क्लास में नसीरुद्दीन शाह, ज्योति देशपांडे, ओम पुरी और बंसी कौल वगैरह थे. पहला साल अजीब सा गुजरा. जयपुर में मैं मशहूर छात्रनेता था जिसके एक आह्वान पर पूरा शहर बंद हो सकता था, और यहां मुझे कोई जानता तक नहीं था. पर तीसरा साल आते-आते सब ठीक हो गया. फिर एक साल एनएसडी के रंगमंडल में रहा. जब उसे छोड़ रहा था तब अन्नू कपूर और पंकज कपूर ने एनएसडी में दाखिला लिया. रंगमंडल छोड़ने के बाद संघर्ष का दौर शुरू हुआ. उन दिनों मैं एक साइकिल स्टैंड में सोया करता था, और एक ढाबे पर उधार खाना खाता था. फिर कुछ समय जयपुर विश्वविद्यालय में रहकर मैं दो साल की एक छात्रवृत्ति पर जापान चला गया.

वहां का अनुभव कैसा था?

बहुत ही अच्छा. लोग वहां के क्लासिकल थियेटर काबुकी के बारे में तो जानते हैं, लेकिन वहां जाने से पहले मुझे नहीं पता था कि सातवीं शताब्दी से चली आ रही सबसे पुरानी शैली है बुनराकू जिसे कठपुतली थियेटर कहा जाता है, लेकिन वह उससे कहीं अधिक एक बेहद जटिल कलारूप है. जापान जाने के बाद एक गंभीर तलाश शुरू हुई कि किस तरह का थियेटर किया जाए. जापान में जहां एक तरफ नोह, काबुकी और बुनराकू है, वहीं दूसरी तरफ शेनगेकी है, शेन माने नया और गेकी माने थियेटर, जो पाश्चात्य रंगमंच से प्रभावित है जैसे हमारे यहां भी है.

और वहां से लौटकर?

जापान से लौटकर मैंने जो काम करना शुरू किया वह मेरे पहले के थियेटर से बिलकुल भिन्न था. इसके पहले मैं हबीब तनवीर का 'आगरा बाजार' नाटक देख चुका था, और उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ था. यह वह समय था जब टीवी आ रहा था और थियेटर के लोग उसमें बड़ी तादाद में जा रहे थे. तो मैं उदयपुर के पास रहने वाले भीलों के गवारी का अध्ययन करने चला गया. वे राखी के अगले दिन से पूरे चालीस दिन अपनी पौराणिक गाथाएं, मिथक और कर्मकांड आदि इसके जरिये प्रस्तुत करते हैं. हमने उस पर एक 16 मिमी की डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई. पहली बार मुझे समाज या समुदाय और सामुदायिक जीवन और उसमें कर्मकांड का महत्व समझ में आया. फिर मैंने उसे अपने थियेटर में समाविष्ट किया.

'तुगलक' तो खुले में हुआ था, बंद ऑडिटोरियम के मंच पर नहीं. कैसा अनुभव रहा?

'तुगलक' से पहले भी मैं 'रसगंधर्व' और 'आषाढ़ का एक दिन' खुले आकाश के नीचे कर चुका था. स्पेस से खेलने का आनंद कुछ और ही है. लोग थियेटर के दर्शक कम होने की बात करते हैं, लेकिन आपने देखा कितने लोग रोज देखने आए. फिल्मों में जो लोग थियेटर करने के लिए छटपटाते रहते हैं, मैंने उनसे कहा कि यहां आइये. आपके काम का वाजिब मानदेय दिलाने की कोशिश करेंगे. दिल्ली सरकार की मदद से वह काम हो गया. सरकार के संरक्षण और प्रोत्साहन के बिना थियेटर करना लगभग असंभव है.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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