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दुनिया

स्कूली बच्चों के सामने दुनिया का नया नक्शा

दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाला विश्व मानचित्र सटीक नहीं हैं. इसमें अमेरिका और यूरोप को बेहद बड़ा दिखाया जाता है. अमेरिका के एक स्कूल ने छात्रों के सामने ज्यादा सटीक नक्शा टांग दिया है.

बॉस्टन पब्लिक स्कूल के बच्चे जैसे ही क्लास में दाखिल हुए, उन्हें नजारा कुछ बदला बदला सा लगा. दीवारों पर नये नक्शे लगे हुए थे. नये नक्शों में अलग दुनिया दिख रही थी. साफ पता चल रहा था कि अफ्रीकी महाद्वीप कितना विशाल है. साथ ही यह भी दिख रहा था कि अमेरिका उतना बड़ा नहीं है, जितना अब तक दिखाया जाता रहा है. भारत और खाड़ी के देशों का बड़ा भूभाग भी पुराने मैप की तुलना में कहीं ज्यादा साफ ढंग से बड़ा दिखाई पड़ा.

दुनिया भर में अब तक मेरकाटर प्रोजेक्शन मैप का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन बॉस्टन के स्कूल ने पीटर्स प्रोजेक्शन मैप को स्वीकार किया है. पीटर्स प्रोजेक्शन मैप में महाद्वीपों के आकार कहीं ज्यादा सटीक दिखाई पड़ता है. स्कूल ने एक बयान जारी कर कहा, "पारंपरिक मेरकाटर नक्शा, उत्तर अमेरिका और यूरोप को दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका से बड़ा दिखाकर भ्रम पैदा करता है. ये मानचित्र (पीटर्स प्रोजेक्शन मैप) धरती की सांस्कृतिक विविधता को बहुत कुशलता से दिखाता है."

(यकीन नहीं आएगा, लेकिन ये असली देश हैं)

मेरकाटर नक्शा 1569 में फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मेरकाटर ने बनाया था. तब से दुनिया इसी का इस्तेमाल करती है. असल में यह नक्शा समुद्री परिवहन को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था. इसकी मदद से साम्राज्यवादी ताकतें अपने उपनिवेशों तक पहुंचती थीं. मेरकाटर ने अपने नक्शे में समुद्र के बीचो बीच सीधी लकीरें भी खींची. समुद्री रास्तों को साफ ढंग से दिखाने के लिए उन्होंने महाद्वीपों के आकार को छोटा बड़ा किया. ज्यादातर साम्राज्यवादी ताकतें यूरोप में थीं, इसी वजह से उत्तरी गोलार्ध के हिस्सों को बड़ा दिखाया गया और दक्षिण गोलार्ध को छोटा.

मेरकाटर के नक्शे में ग्रीनलैंड पूरे अफ्रीकी महाद्वीप से बड़ा दिखता है. अगर सच्चाई की बात की जाए तो अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है. वहीं पुराने नक्शे में यूरोप को दक्षिण अफ्रीकी महाद्वीप से बड़ा दिखाया गया है, लेकिन असल में दक्षिण अमेरिका यूरोप का दोगुना है.

इसे 1974 में जर्मन इतिहासकार आर्नो पेटर्स ने प्रकाशित किया था. इसी वजह से इसे पीटर्स प्रोजेक्शन कहा जाता है. यह नक्शा 1800 वाली शताब्दी के दौरान स्कॉटिश कार्टोग्राफर जेम्स गॉल के मैप से बहुत मिलता जुलता है. इस कारण इसे गॉल-पीटर्स प्रोजेक्शन भी कहा जाता है. गॉल-पीटर्स प्रोजेक्शन में धरती पर मौजूद हर जमीनी भूभाग का सटीक ब्यौरा मिलता है. समीक्षकों के मुताबिक पुराने नक्शे में पिछड़े देशों के आकार की अनदेखी की गई है.

(सिर्फ एक पड़ोसी है इन देशों का)

 

 

 

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