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मंथन

सोलर ट्री, बिजली पैदा करने वाला पेड़

भारत और जर्मनी के वैज्ञानिक बिजली पैदा करने वाला सौर पेड़ विकसित कर रहे हैं. यह पेड़ आम सोलर पैनलों के मुकाबले कहीं ज्यादा असरदार और किफायती होगा.

आईआईटी कानपुर और जर्मनी की केमनित्स यूनिवर्सिटी ने मिलकर सोलर ट्री विकसित की है. यह ऐसी उम्दा सोलर तकनीक है जो बिल्कुल भी इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा नहीं होने देती. केमनित्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आरवेड सी ह्यूबल इस बारे में बताते हैं, "इसे स्थानीय तौर पर बनाया जा सकेगा. कोई हाईटेक उत्पाद बनाने के लिए चीन या यूरोप में निर्माण होना जरूरी नहीं." लक्ष्य यह है कि भारत और दूसरे देशों में जो प्रिंटर आजकल अखबार छापते हैं, वे भविष्य में सोलर पैनल भी छाप सकें और बेच सकें. तकनीक को बेहतर करने के बाद एक सोलर ट्री आराम से एक घर को रोशन करेगी. आम सोलर पैनलों के उलट, सोलर ट्री की पत्तियां किसी खनिज के बजाए, खास तरह की स्याहियों से बनी हैं. डाई की मदद से सौर पत्तियों को कहीं भी आसानी से प्रिंट किया जा सकता है. केमनित्स टेक्निकल यूनिवर्सिटी और आईआईटी कानपुर की यह खोज पर्यावरण के लिहाज से भी जबरदस्त है.

केमनित्स टेक्निकल यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रहे तसलीम खान इस प्रोजेक्ट के बारे में बताते हैं, "ये सोलर सेल पूरी तरह जैविक हैं. मुख्य मैटीरियल आम कागज है जो आप रोजमर्रा की जिंदगी में देखते हैं. जो स्याहियां हम इस्तेमाल कर रहे हैं वो भी पूरी तरह जैविक हैं. इन सेलों को घर पर इस्तेमाल होने वाले फूड पैकेट या आम कागज की ही तरह रिसाइकिल किया जा सकता है." हल्की और इको फ्रेंडली होने के बावजूद फिलहाल सौर पत्तियां महंगी हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के साथ ही कीमत नीचे आएगी और तकनीक भी बेहतर होगी.

प्रोफेसर आरवेड सी ह्यूबल खहते हैं, "मुझे लगता है कि भविष्य के लिए यह जरूरी है कि ऊर्जा सस्ती हो. इसे सस्ता रखने के लिए सरकारी सब्सिडी ना लगे और हम इसी राह पर हैं." इस प्रोजेक्ट का मकसद बेहद सस्ती बिजली पैदा करने की तकनीक तक पहुंचना है. सोलर पैनल अब बीते दौर की बात बन रहे हैं. नई तकनीक सौर ऊर्जा को घरों और इमारतों से बाहर ला रही है. भविष्य में हाईवे और सड़कों के किनारे सोलर ट्री लगाए जा सकेंगे. जर्मनी और भारत के वैज्ञानिक साथ मिलकर ऐसी कई संभावनाएं तलाश रहे हैं.

इंडो जर्मन साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर के निदेशक ए चक्रवर्ती कहते हैं, "हम कई तरह से जर्मनी के साथ साझीदारी कर रहे हैं. इन दिनों ऊर्जा सिर्फ भारत और जर्मनी के लिए ही मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक मुद्दा है." चक्रवर्ती का कहना है कि विकास करता कोई भी देश प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत ऊंची करने के लिए ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने पर विचार करेगा. इसीलिए भारत और जर्मनी आईजीएसटीसी मॉडल के जरिए कई प्रोजेक्ट्स साथ कर रहे हैं. निवेशक इस रिसर्च में पैसा लगा चुके हैं. फिलहाल बाजार में मिलने वाले सोलर पैनल 15 से 20 साल बाद इलेक्ट्रिक कचरा छोड़ते हैं, लेकिन प्रिंट किया जा सकने वाला सोलर पेपर, प्रकृति का भी ख्याल रखेगा.

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