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विज्ञान

सोने का बड़ा उत्पादक

तंजानिया अफ्रीकी महाद्वीप का चौथा सबसे बडा सोना उत्पादक देश है. बड़ी बड़ी कंपनियां तो यहां सोना निकालती ही हैं लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो अवैध तरीके से छोटे छोटे पत्थर चुराने की कोशिश में रहते हैं.

इस तरह सोना चुराने वाले लोगों को तंजानिया में घुसपैठिए कहा जाता है. खान से निकले पत्थरों की जैसे ही जानकारी मिलती है लोग वहां अपनी किस्मत आजमाने चल देते हैं.

तंजानिया के केवान्या गांव के करीब 70 फीसदी स्थानीय निवासी फेंके गए पत्थरों की गैरकानूनी चोरी से फायदा उठाते हैं.

North Mara Gold Mine in Tansania

सोने के घुसपैठियों की कमाई

यहीं खान से सोना निकालने वाली कनाडा की कंपनी ने 2011 में दो करोड़ 15 लाख यूरो का कारोबार किया. साल 2000 से यह कंपनी तंजानिया की चार खदानों से सोना निकाल रही है. 2011 में जब सरकार ने निवेश से रियायतें हटाईं तो कंपनी ने टैक्स देना शुरू किया. कंपनी का मानना है कि खनन और टैक्स चुकाने के अलावा उसकी सामाजिक जिम्मेदारियां भी हैं. अफ्रीकन बैरेक गोल्ड कंपनी के महाप्रबंधक गैरी चैपमैन के मुताबिक, "समय, निरंतरता और यहां के लोगों के साथ भरोसा बढ़ने से हम सम्मान पा सकेंगे. मुझे नहीं लगता कि हम ये चाहेंगे कि लोग हमें प्यार करें, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि एक दूसरे का सम्मान करने, साथ काम करने और विकास की संभावनाएं टटोलना ही आदर्श रास्ता हो सकता है." इतने साल वहां खनन कर रही कंपनी ने एक साल पहले ही तंजानिया की सामाजिक योजनाओं में निवेश करना शुरू किया है. इसमें स्कूलों की मरम्मत से लेकर कुछ दूसरे प्रोजेक्ट शामिल हैं.

जहरीला काम

तंजानिया के ही उत्तरी मारा इलाके में सिर्फ घुसपैठ कर पत्थर चुराना ही पेशा नहीं. यहां ऐसे भी लोग हैं जो पत्थरों से सोना निकालते हैं. सोना निकालने के लिए वे जहरीले पारे का इस्तेमाल करते हैं. पुलिस को रिश्वत देकर दूर रखा जाता है. इस गैरकानूनी काम में ठीक ठाक पैसा है. कई लोगों ने अपना पुश्तैनी काम भी छोड़ दिया है. भले ही यह काम स्वास्थ्य को जोखिम में डाले लेकिन कई लोगों की साल भर की कमाई सोना निकाल कर एक ही दिन में हो जाती है. अरहर की दाल के दाने जितना सोना करीब 21 यूरो यानी अंदाजन 15000 रुपये का है. लेकिन इसे निकालने वाले आए दिन अपनी और पर्यावरण की सेहत को पारे से नुकसान पहुंचा रहे हैं. पैसा है, पर जोखिम है. तंजानिया की गरीबी इसी संघर्ष से गुजर रही है.

रिपोर्टः आभा मोंढे

संपादनः एन रंजन

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