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दुनिया

सैन्य शासित म्यांमार में चुनाव पूरे

सैन्य शासित म्यांमार में रविवार को डराने धमकाने की शिकायतों के बीच 20 सालों में पहली बार संसदीय चुनाव पूरे हुए. लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची को चुनाव के मौके पर भी रिहा नहीं किया गया.

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सैन्य शासन समर्थक दो पार्टियों ने कुल उम्मीदवारों में दो तिहाई उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा किया है. नोबेल पुरस्कार विजेता सू ची की पार्टी ने 1990 के संसदीय चुनावों में भारी जीत हासिल की थी लेकिन सैनिक शासकों ने चुनाव नतीजों को मानने से इंकार कर दिया था. पिछले बीस साल में ज्यादातर समय नजरबंद रही सू ची ने चुनाव के बहिष्कार का समर्थन किया है.

भारत का दौरा कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मतदान केंद्रों के बंद होने से पहले ही टिप्पणी की कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष कतई नहीं होंगे. देश के पुराने नाम का इस्तेमाल करते हुए ओबामा ने कहा, लंबे समय से बर्मा के लोगों को अपने भविष्य का फैसला करने के अधिकार से वंचित रखा गया है.

Wahl in Birma

चुनाव की शर्तों की व्यापक आलोचना के बावजूद कुछ लोग इसे निरंकुश तानाशाही के पांच दशकों बाद पहली बार लोकतंत्र की दिशा में एक कदम मान रहे हैं. संसद में पहली बार विपक्षी पार्टियों का प्रतिनिधित्व होने की संभावना है.

सैनिक जनरलों की अलोकप्रियता के बावजूद सेना समर्थक पार्टी यूनियन एकजुटता और विकास पार्टी (यूएसडीपी) के जीतने की उम्मीद की जा रही है. कई चुनाव क्षेत्रों में यूएसडीपी और नैशनल यूनिटी पार्टी (एनयूपी) के बीच सीधी टक्कर है.

दो सदनों वाली राष्ट्रीय और 14 प्रांतीय संसदों में एक चौथाई सीटें सेना मनोनीत करेगी . यह साफ नहीं है कि चुनावी नतीजों की घोषणा कब होगी. दो विपक्षी पार्टियों ने हाल ही में सेना से रिटायर हुए मंत्रियों की बनाई यूएसडीपी पार्टी पर अवैध रूप से पोस्टल मतपत्र इकट्ठा किए जाने का आरोप लगाया है.

ब्रिटिश राजदूत एंड्र्यू हाइन ने अग्रिम वोटिंग की अनियमितताओं की रिपोर्टों पर कहा है, "मैं समझता हूं कि निश्चित तौर पर धमकाने के मामले हुए हैं." सू ची की प्रतिबंधित पार्टी के भूतपूर्व सदस्यों द्वारा बनाई गई नैशनल डेमोक्रैटिक फोर्स ने कहा है कि कुछ लोगों ने उन्हें बताया है कि यूएसडीपी ने उन्हें कहा है कि वोट देने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनके वोट इकट्ठा हो गए हैं.

Wahl in Birma

लगभग तीन करोड़ लोगों को इन चुनावों में वोट देने का अधिकार था. सैनिक शासन ने विदेशी पर्वेक्षकों को चुनाव के मौके पर देश आने की अनुमति नहीं दी. स्थानीय पत्रकारों पर भी कड़ा नियंत्रण है. थाइलैंड से अवैध रूप से म्यांमार में घुसने के आरोप में एक जापानी पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया है.

चुनाव हो जाने के बाद भी सैनिक प्रमुख थान श्वे के इरादों पर रहस्य का पर्दा चढ़ा हुआ है. कुछ अटकलों में कहा गया है कि वे सेना प्रमुख के पद से इस्तीफा दे सकते हैं. लेकिन वे सत्ता पर अपनी पकड़ छोड़ देंगे इसकी उम्मीद कोई नहीं कर रहा.

रिपोर्ट: एजेंसियां/महेश झा

संपादन: एन रंजन

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