1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

सेहत को संजीदगी से लेना इंसानी फितरत नहीं

क्या आइसक्रीम या समोसे खाते हुए यह ख्याल आता है कि इससे मोटे हो जाएंगे? लेकिन बाद में पछतावा जरूर होता है. क्यों हम सब जानते हुए भी खुद को रोक नहीं पाते? क्या है इसके पीछे का मनोविज्ञान?

घर में माता पिता अक्सर बच्चों को खाने पीने या उठने बैठने के तौर तरीकों पर टोकते रहते हैं. अक्सर उन्हें यह कहते सुना जाता है, "जब हमारी उम्र में आओगे, तब समझोगे." रिसर्च के अनुसार बच्चों का नसीहतों को नजरअंदाज करना कोई अनोखी बात नहीं क्योंकि इंसानी फितरत ही ऐसी है. जर्मनी में मनोवैज्ञानिकों के संघ बीडीपी की अध्यक्ष डॉक्टर यूलिया शार्नहॉर्स्ट का कहना है कि जब सेहत की बात आती है, तो अधिकतर इंसान सूझबूझ से पेश नहीं आते. उनका कहना है, "सेहत को ले कर हम अपनी समझ का इस्तेमाल बहुत ही सीमित रूप से करते हैं."

वे उदाहरण देते हुए कहती हैं कि अगर आप 15 साल के एक बच्चे को समझाएंगे कि सिगरेट पीने से वह 65 साल की उम्र में ही मर जाएगा, तो वह आपकी बात को अनसुनी कर देगा. इसकी वजह वे कुछ इस तरह बताती हैं, "ज्यादातर लोग इस तरह से नहीं सोचते कि अगर आज से मैं नियमित रूप से कसरत करना शुरू कर कर दूं या ठीक से खाने लगूं, तो मेरी जिंदगी के पांच साल बढ़ जाएंगे. अधिकतर लोगों के लिए इतने लंबे समय के बारे में सोचना मुश्किल होता है, वे केवल निकट भविष्य के बारे में ही सोचते हैं."

रिसर्च दिखाता है कि लोग अपनी सेहत को ले कर तब तक संजीदगी नहीं दिखाते, जब तक वे अपनी ही उम्र के किसी करीबी को बीमारी से गुजरते हुए नहीं देखते या फिर खुद ही बीमार नहीं हो जाते. ज्यादातर मामलों में ऐसा होने के बाद ही वे अपने लाइफस्टाइल में बदलाव लाते हैं. शार्नहॉर्स्ट इस बारे में कहती हैं, "हम अपने स्वास्थ्य के बारे में तब कुछ करना शुरू करते हैं, जब बुरी खबर आने लगती है. लंबे वक्त के बारे में सोचना हमारी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं है."

इतना ही नहीं, सेहत का ध्यान किस तरह से रखा जाता है, यह भी उस वक्त चल रहे "फैशन" के हिसाब से तय होता है. यही वजह है कि कभी "लो कार्ब डायट" का चलन चल पड़ता है, तो कभी वीगन डायट का. शार्नहॉर्स्ट के अनुसार ये सब "बकवास" है और इनके लोकप्रिय होने की भी यही वजह है कि "लोग सेहत को ले कर समझ बूझ के साथ फैसले ले ही नहीं पाते."

इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि क्यों नए साल में लिए गए प्रण कुछ दिनों, हफ्तों या महीनों में भुला दिए जाते हैं. लोग खुद से वादा तो करते हैं कि नियमित रूप से कसरत करेंगे, शराब को हाथ नहीं लगाएंगे, सिर्फ उबली सब्जियां खाएंगे. लेकिन साल के अंत तक कोई अपना वादा नहीं रख पाता. क्योंकि इतने दूर तक सोचना इंसानी आदत में ही नहीं है.

DW.COM

संबंधित सामग्री