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ताना बाना

सेवा भाव से दुनिया जीतने वाली मदर टेरेसा

जब यह दुनिया एक विश्व युद्ध झेल, दूसरे की तैयारी कर रही थी, जब यूरोप के दो खूंखार तानाशाह धरती को रक्त से लाल कर देना चाह रहे थे, तभी इसी यूरोप की छोटे से कद की एक महिला ने दुनिया बदल दी. मदर टेरेसा इसी बदलाव नाम हैं.

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चार फुट दस इंच की मदर टेरेसा ने नीली पट्टी वाली सफेद साड़ी से वह कर दिखाया, जिसके सामने बड़े बड़े तानाशाहों ने घुटने टेक दिए. इस महिला ने अपनी जंग का अलग मैदान चुना. सड़कों के बीमार और लावारिस दम तोड़ते लोग और गुमनाम गुरबत से भरी झुग्गियों का मैदान. क्या जंग चली. क्या जीत मिली. लाख जोर लगाने पर भी पिछली सदी में मदर टेरेसा से ज्यादा लोकप्रिय शख्सियत जेहन में नहीं आता.

सिर पर छत न हो और कुष्ठ रोग से बदन गलने लगे, तो मरने का मन भले न करता हो, जीना भी अच्छा नहीं लगता होगा. लेकिन अगर कोई अपने हाथों से जख्मों को साफ करे, उन पर पट्टी लगाए. खाना खिलाए और रहने को छत भी दे दे, तो शायद जिन्दगी में कुछ रस आ सकता है. अंधेरी बंद सुरंग में रोशनी की तरह.

भारत में यह रोशनी बहुत दूर से आई थी. मैसिडोनिया के स्कोप्जे शहर से. अलबेनियाई मूल की उन्नीस साल की एक नन एगनस यूं तो लॉरेटो कॉन्वेंट में पढ़ाने के लिए भारत पहुंची लेकिन बीस साल बाद उसे समझ आया कि उसकी दुनिया तो कहीं और बसती है. सड़कों पर, झुग्गियों में, गरीबों में. लाचारों में. ईसाइयों के सबसे बड़े चर्च वैटिकन ने उसे उसकी दुनिया दे दी. यह पहली और इकलौती मिसाल है, जब वैटिकन ने किसी नन को बंद कमरों से बाहर रहने की इजाजत दी, उसे अपना अलग ऑर्डर शुरू करने की अनुमति दी.

Flash-Galerie Mutter Teresa

मदर टेरेसा की कुछ दुलर्भ तस्वीरें

1950 में शुरू हुआ यह सिलसिला अब भी चल रहा है. मिशनरी ऑफ चैरिटीज को दुनिया भले ही ईसाई धर्म से जुड़ी संस्था माने लेकिन ऐसा है नहीं. मदर टेरेसा की महानता ने इसे ऐसा नहीं बनने दिया. सड़कों पर मिले बीमारों की तीमारदारी करने से पहले वह उनका मजहब नहीं पूछती थीं, भूखों को दो निवाले देने से पहले उनकी जाति नहीं पूछी जाती और न ही दम तोड़ते गरीब को सड़क से उठा कर होमलेस होम में लाते हुए उससे पूछा जाता कि उसका नाम सिंह है, खान या जेम्स.

नीली पट्टी वाली सफेद साड़ी में लिपटा वह शरीर याद आता है, जिसकी पीठ झुक गई थी. लेकिन जिसके चेहरे पर बला का तेज था. शांति थी. एक मां तो सिर्फ अपने बच्चे से प्यार कर सकती है. इसने तो अपने परायों का भेद ही खत्म कर दिया. दुनिया की कई मांएं होंगी, जो ममता के मायने सिर्फ मदर टेरेसा से तय करती होंगी.

Flash-Galerie Mutter Teresa

बच्चों की बीच मदर टेरेसा

पैबंद लगी साड़ी और टेढ़े मेढ़े हाथ पैर वाली इस महिला की बहादुरी उस वक्त सामने आई, जब इसने 1982 में जंग में धधकते बेरूत में घुस कर वहां फंसे 37 बच्चों को बाहर निकाला. बारह लोगों से शुरू हुआ मिशन हजारों लोगों का मिशन बन गया है. रेड क्रॉस की तरह नीली पट्टी वाली सफेद साड़ी पूरी दुनिया में पहचानी जाने लगी है. एक सौ पैंतीस देशों में ऑर्डर खुल गए और हजारों महिलाएं सेवा भाव में जुड़ गईं.

सवाल भी उठे. कभी मदर टेरेसा ने खुद अपने यकीन पर सवाल उठाए, जिसे अध्यात्म के अंधकार का नाम दिया गया, तो कभी उन्हें मिलने वाले पैसों पर दुनिया ने सवाल उठाए कि उन्हें कौन पैसे देता है. क्यों देता है. मदर टेरेसा ने इनका जवाब नहीं दिया. अपने ईश्वर पर छोड़ दिया. बीच बीच में नोबेल का शांति सम्मान और भारत रत्न जैसे पुरस्कार भी मिले, लेकिन मदर टेरेसा के लिए इनके कोई मायने नहीं थे.

गुजरने के बाद मदर टेरेसा को संत बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. नियमों के तहत उनसे जुड़े दो चमत्कार साबित होने पर उन्हें संत का दर्जा दे दिया जाएगा. एक चमत्कार साबित हो चुका है, दूसरे का इंतजार है. लेकिन क्या जादुई मदर टेरेसा को क्या सचमुच संत जैसी किसी पदवी से दिलचस्पी होगी.

रिपोर्टः अनवर जे अशरफ

संपादनः ओ सिंह

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