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खेल

सेप ब्लाटर: फीफा के मसीहा या शैतान

लोग लंबे समय से यह सवाल करते आए हैं कि फीफा अध्यक्ष सेप ब्लाटर आखिर इतने विवादों के बावजूद बच कैसे जाते हैं. लेकिन अब इस इस्तीफे के साथ ब्लाटर का समय पूरा हो गया है. एक नजर उनकी शोहरत और पतन पर.

1960 के दशक में जोसेप ब्लाटर स्विट्जरलैंड के फुटबॉल क्लब विस्प में बतौर मिडफील्डर फुटबॉल खेला करते थे. वे अपने क्लब के मुख्य कोच भी रहे. लेकिन उस जमाने में कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन वे फुटबॉल जगत की सबसे प्रभावशाली शख्सियत बन जाएंगे. सेप ब्लाटर का जन्म 1936 में विस्प शहर में हुआ. पिता मैकेनिक थे. स्कूल खत्म करने के बाद ब्लाटर ने लुसान में बिजनेस और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की. जल्द ही वे पीआर जगत में उठने बैठने लगे. पहले उन्होंने अपने प्रांत के पर्यटक संघ में नौकरी की और फिर एक घड़ी निर्माता के यहां.

एडिडास से नजदीकी

39 की उम्र में उन्होंने फील्ड के बाहर अपना असली करियर शुरू किया. उस समय के फीफा अध्यक्ष जोआओ आविलांजे ने ब्लाटर को फीफा से जुड़ने की पेशकश की. ब्लाटर ने 'यूथ वर्ल्ड कप' का कार्यभार संभाला और एडिडास के संस्थापक हॉर्स्ट डासलर ने आर्थिक रूप से उनकी मदद की. माना जाता है कि उन्होंने ही ब्लाटर को एल्सास में एक बड़ा सा दफ्तर भी दिलवाया.

1981 में जब ब्लाटर फीफा के मुख्य सचिव बने, तब एडिडास के साथ बढ़ती नजदीकियां नजर आईं. यह फीफा का दूसरा सबसे अहम पद था. इसी पर रहते हुए ब्लाटर ने वर्ल्ड कप के टीवी अधिकार बेचे और स्पॉन्सरों के जरिए खूब पैसा कमाया. उन्होंने फुटबॉल में कई महत्वपूर्ण बदलाव भी किए. थ्री प्वाइंट रूल उन्हीं के रहते लागू हुआ.

विवादों से कोई फर्क नहीं

फिर 1998 में ब्लाटर फीफा के अध्यक्ष चुने गए. जोआओ आविलांजे के बाद ब्लाटर ने फीफा का सबसे ऊंचा पद संभाला. स्वीडन के लेनार्ट योहानसन भी इस पद के अहम दावेदार थे. उस वक्त ब्लाटर पर आरोप लगे कि उन्होंने अफ्रीकी प्रतिनिधियों से वोट लेने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए. लेकिन ब्लाटर ने इन्हें अफवाहें बता कर किनारे कर दिया. तब से अब तक सेप ब्लाटर को विवादों से कोई फर्क नहीं पड़ा है. उनका सबसे ज्यादा विवादास्पद मामला रहा मार्केटिंग पार्टनर कंपनी आईएसएल का. अदालत में भी यह बात साबित हुई कि कंपनी ने फीफा अधिकारियों को रिश्वत दी. एक और मामला जो साबित हुआ, वह था कि मुख्य सचिव के पद पर रहते हुए ब्लाटर को रिश्वतखोरी की जानकारी थी. ब्लाटर ने इसे 'कमीशन' का नाम दिया और मामले पर लाखों डॉलर के खर्च के बाद 2010 में वे बेगुनाह साबित हो गए.

2011 में जब वे चौथी बार अध्यक्ष चुने गए, तब उन्हें अपनी ही संस्था में भ्रष्टाचार का फायदा मिला. कतर के मुहम्मद बिन हमाम उनके प्रतिद्वंदी थे. लेकिन कैरेबियन प्रतिनिधियों को वोट के बदले रिश्वत देने की खबर के कारण उन्हें अपना नामांकन वापस ले लेना पड़ा. बाद में उन्होंने कहा कि ब्लाटर खुद इसके बारे में जानते थे. उस समय ब्लाटर ने कहा था, "संकट, संकट क्या होता है? हमारे यहां सिर्फ कुछ समस्याएं हैं."

वफादार समर्थकों के कारण

इसके बाद रूस और कतर को 2018 और 2022 के फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी दिए जाने पर भी ब्लाटर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. लोग लगातार यह सवाल करते रहे हैं कि आखिर ब्लाटर हमेशा विवादों से अपनी गर्दन कैसे बचा लेते हैं. ब्लाटर अच्छी तरह जानते थे कि ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है. उन्होंने अपने आलोचकों की बातों को हमेशा हंस कर टाल दिया, अंदरूनी बगावतों को चुपचाप दबा दिया, अपने दुश्मनों के पर काट दिए और इस तरह से हर दिक्कत से बचे रहे. लेकिन यह सब एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका में मौजूद उनके वफादार समर्थकों के कारण ही मुमकिन हो पाया.

17 साल तक ब्लाटर लेनदेन का खेल बखूबी खेलते रहे हैं. एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, "मैं वह अध्यक्ष हूं जो उन लोगों के लिए बोलने की हिम्मत रखता है, जिनके पास अपनी कोई आवाज नहीं, मैं वाकई उन छोटे लोगों का अध्यक्ष हूं." बहुत से देशों में ब्लाटर को फुटबॉल के मसीहा के रूप में सराहा जाता है. वे स्थानीय फुटबॉल संघ की मदद करते रहे हैं. 'विदेशी सहायता' के नाम पर वे उन्हें आर्थिक मदद भी दिलाते रहे हैं. यह पैसा कहां से आता रहा है, यह देखना बाकी है. ब्लाटर ने कई बार कहा है कि फुटबॉल से जुड़ी भावनाओं के कारण फीफा दुनिया के किसी भी देश या धर्म से ज्यादा ताकतवर है. लेकिन अब आखिरकार उन्हें अपनी ताकत छोड़नी पड़ रही है.

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