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दुनिया

सेक्स का धंधा छूटा, अब आम जिंदगी ही सबसे खास है

मुंबई की सोनिका के लिए अब कामकाजी दिन की शुरुआत जल्दी जल्दी लंच पैक और नाश्ता करने के बाद भाग कर 8:45 की बस पकड़ने से पहले एक सेल्फी लेने के साथ होती है. 19 लाल की सोनिका के लिए जिंदगी का आम होना ही सबसे अहम है.

दो साल पहले तक सोनिका एक सेक्सवर्कर थी जहां हर रोज उसे शारीरिक और मानसिक यंत्रणा झेलनी पड़ती थी. सोनिका कहती है, "मुझे जिंदगी से नफरत हो गयी थी लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था. मेरा दिन 18 घंटे से भी ज्यादा लंबा होता था, मैं मर जाना चाहती थी." सोनिका को 13 साल की उम्र में ही तस्करी के जरिए मुंबई लाकर इस धंधे में उतार दिया गया.

इस साल की शुरुआत में सोनिका को एक आम घर में लाया गया जहां वह एक रूममेट के साथ रहती है. तस्करी कर लायी गयी लड़कियों की जिंदगी सुधारने में लगे एक गैरसरकारी संगठन की मदद से सोनिका को अपनी पिछली जिंदगी से छुटकारा मिल सका है. यह संगठन सोनिका जैसी लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करता है. अपने अपार्टमेंट में बैठी सोनिका ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "मैं यहां सुरक्षित महसूस करती हूं, मेरी अपनी दिनचर्या है. मैं जो करना चाहती हूं वही करती हूं."

सोनिका अपना पूरा नाम नहीं बताना चाहती. वह मुंबई से छुड़ायी उन 50 लड़कियों में है जिन्हें तस्करी कर यहां लाया गया था. इस गैरसरकारी संगठन ने इन्हें नौकरी ढूंढने और स्वतंत्र रूप से रहने में मदद दी है. भारत में करीब 2 करोड़ सेक्सवर्कर हैं. इनमें डेढ़ करोड़ से ज्यादा लड़कियों और औरतों को तस्करी के जरिये लाकर इस धंधे में धकेल दिया जाता है. इममें आधी से ज्यादा नाबालिग बच्चियां होती हैं. कई बार तो महज 9 साल की ही. कई अध्ययनों से पता चलता है कि देह व्यापार से छुड़ायी गयी लड़कियां फिर इस काम में लौटने पर मजबूर हो जाती हैं क्योंकि उनके पास अपने खर्चे के लिए कमाई का कोई जरिया नहीं होता.

सरकारी हॉस्टल या फिर समाजसेवी संस्थाओं के पुनर्वास केंद्रों में इन्हें कामकाज की कुछ ट्रेनिंग दी जाती है लेकिन कम ही हैं जो इन जगहों से बाहर निकल कर नौकरी करना चाहती हैं. सोनिका को छुड़ाने वाले संगठन की नींव रखने वाली भारती तहलियानी कहती हैं, "वे कभी भी संस्थाओं की देखभाल से बाहर नहीं निकल पातीं, वे कभी स्वतंत्र नहीं हो पाती हैं. सोनिका बाहर निकली, खुद से रह रही है, रूम मेट और अपने सहकर्मियों पर भरोसा कर रही है. यह हमारे लिए बड़ी जीत है. और निश्चित रूप से उसके लिए भी."

भारत सरकार के हाल ही में जारी आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में साल दर साल मानव तस्करी के मामले बढ़ते जा रहे हैं. सरकार नाबालिगों को तो मुआवजा देती है लेकिन बालिगों को सरकार से कोई मदद नहीं मिलती. भारत में देह व्यापार गैरकानूनी है. पुलिस अकसर छापे मार कर लड़कियों को आजाद कराती है. तहलियानी कहती हैं, "2007 में हमने छुड़ायी गयी लड़कियों पर रिसर्च किया तो पता चला कि केवल 10 फीसदी ही समाज में वापस लौट पाती हैं. हम ज्यादातर लड़कियों के बारे में पता भी नहीं लगा सके." तहलियानी ने ऐसी लड़कियों को मदद देने के लिए 2013 में अपना संगठन बनाया ताकि उन्हें स्वतंत्र रूप से जिंदगी बिताने का मौका मिल सके. तहलियानी कहती हैं, "यह एकमात्र तरीका है इन लड़कियों को फिर से तस्करी से बचाने का."

इन लड़कियों के पुनर्वास के लिए इन्हें सिलाई, बुनाई, कढ़ाई और इसी तरह के दूसरे काम सिखाये जाते हैं. साथ ही इन्हें लोगों से मिलने जुलने और बातचीत करने के तौर तरीकों से भी परिचित कराया जाता है. 

सोनिका ने चौथी क्लास तक पढ़ाई की थी और उसे नौकरी के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा. वह गहने की दुकान में सेल्सगर्ल बनना चाहती थी लेकिन इसके लिए उसका अंग्रेजी में बातचीत करना जरूरी था. फिर उसे एक कपड़े की फर्म में नौकरी मिली जहां उसे दुकानों में कपड़े पहुंचाने और वहां से पैसे लेकर आना होता. इसके साथ ही उसे नोटबुक में हर लेन देने का हिसाब भी रखना होता है.

9 घंटे के काम के बदले उसे यहां से हर महीने 9000 रुपये मिलते हैं. वह अपनी एक दोस्त के साथ एक कमरे के फ्लैट में रहती है जिसका किराया 4000 रुपये है. उसकी दोस्त भी पहले सेक्स वर्कर रह चुकी है. वह अब एक सुपरमार्केट में काम करती है और 12000 रुपये हर महीने कमाती है. इसी तरह की और भी लड़कियां हैं जिन्हें अलग अलग काम मिला है.

थकाने वाला काम या फिर हर रोज मुंबई की सड़कों और लोकल ट्रेनों में धक्के खाना, इन लड़कियों को अब इन सबकी कोई परवाह नहीं. कई बार इन्हें मकान मालिकों को समझाने में भी दिक्कत होती है जो अकेली लड़कियों को मकान देने के लिये तैयार नहीं होते. पर कोई ना कोई रास्ता निकल ही आता है. सोनिका अकेले रहना चाहती थी और उसे भी काफी दिक्कत हुई लेकिन उसकी दोस्त के पति ने मदद की और अब उसकी अपनी दुनिया है. सोनिका ने अपने ख्वाब पूरे कर लिये हैं.

एनआर/एके (रॉयटर्स)

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