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विज्ञान

सूर्य की रोशनी से ईंधन बनाने में कामयाबी

अमेरिका और स्विटजरलैंड के वैज्ञानिकों ने सूर्य की रोशनी से ईंधन बनाने में सफलता हासिल कर ली है. उन्होंने ऐसी मशीन बनाई है जो सूर्य की रोशनी का इस्तेमाल कर हाइड्रोजन बनाएगी. पौधों की नकल करती है ये मशीन.

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1905 में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटाइन ने E=MC2 बताकर विज्ञान का एक बड़ा रहस्य उजागर कर दिया. उनकी खोज ने बताया कि द्रव्यमान और निर्वात में प्रकाश की गति से कैसे असीमित ऊर्जा पैदा की जा सकती है. इसका जीता जागता उदाहरण सूर्य है. 1940 के दशक में इसी समीकरण के आधार पर परमाणु बम बनाया गया.

लेकिन तभी से वैज्ञानिक इस गुत्थी में उलझे रहे कि अगर किसी पदार्थ के द्रव्यमान और प्रकाश से ऊर्जा पैदा की जा सकती है तो फिर ऊर्जा से कोई पदार्थ क्यों नहीं बनाया जा सकता. अब करीब 105 साल बाद वैज्ञानिक ऊर्जा से पदार्थ बनाने के करीब सरक रहे हैं.

अमेरिका और स्विटजरलैंड के वैज्ञानिकों ने एक प्रोटोटाइप सोलर डिवाइस तैयार की है. इसमें सिरियम ऑक्साइड (सिरिया) की मदद ली जाती है. मशीन के ऊपरी हिस्से में एक शंकु के आकार का बड़ा छेद है, जो सूर्य की किरणों को नीचे के छोटे मुंह की तरफ धकेलने का काम करता है.

Bilder vom Sonnenobservatorium der NASA Flash-Galerie

नीचे एक बेलनाकार चैंबर में सिरियम ऑक्साइड की एक परत चढ़ाई गई है. जिस पर एल्युमिना यानी एल्युमिनियम ऑक्साइड का लेप लगाया गया है. इस चैंबर में कॉबर्न डाईऑक्साइड और पानी भरा जाता है.

सिरियम ऑक्साइड सूर्य की रोशनी से गर्म होने पर ऑक्सीजन छोड़ता है और ठंडा होने पर ऑक्सीजन सोखता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक सूर्य की रोशनी पड़ते ही चैंबर में हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड बनने लगती है.

इस हाइड्रोजन का इस्तेमाल फ्यूल हाइड्रोजन सेल की तरह कार के ईंधन के रूप में किया जा सकता है. हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड के मिश्रण को सिनगैस यानी सिथेंसिस गैस कहा जाता है. इसका इस्तेमाल डीजल और मीथेन बनाने में किया जा सकता है.

सिथेंसिस गैस पेड़ पौधे भी छोड़ते हैं. प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में पौधे सूर्य की रोशनी की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड और जमीन से सोखे पानी को कार्बोहाइड्रेट्स में बदलते हैं.

प्रोटोटाइप सोलर डिवाइस भी इसी क्रिया को दोहराने की कोशिश है. इस मशीन से फिलहाल 19 फीसदी ईंधन बनने की गुंजाइश है. लेकिन कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की प्रोफेसर सोसिना हैले इस बढ़िया कामयाबी बताती हैं.

वह कहती हैं, ''यह पहला प्रयोग है जिसमे प्रकाश के फोटोन को रिएक्टर में डाला गया और रसायनिक क्रिया सही ढंग से होती चली गई.'' वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुवों में ये मशीनें लगाकर काफी ईंधन हासिल किया जा सकता है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/ओ सिंह

संपादन: एस गौड़

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