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दुनिया

सूचना का अधिकार बना हथियार

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून आम लोगों के लिए बना था ताकि लोग सरकार के कामकाज के बारे में सूचनाएं हासिल कर सकें. यही अधिकार अब माओवादियों का नया हथियार बनता जा रहा है.

सूचना के अधिकार का माओवादियों का हथियार बनने का खुलासा झारखंड में माओवादियों के एक प्रशिक्षण शिविर पर छापेमारी के दौरान बरामद दस्तावेजों से हुआ है. तोरपा इलाके के जंगलों में चल रहे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया के इस शिविर से बरामद दस्तावेजों में खूंटी जिले में चलने वाली तीस से ज्यादा सरकारी परियोजनाओं की लागत, उस पर काम करने वाले ठेकेदारों और दूसरे संबंधित लोगों का पूरा ब्योरा था. खूंटी के पुलिस अधीक्षक एम. तमिल वनन कहते हैं, "माओवादी किसी ठेकेदार की हैसियत का पता लगना के लिए आरटीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. उसके बाद संबधित ठेकेदार से वसूली जाने वाली रकम तय की जाती है."

इलाके में पुलिस को पिछले कुछ समय से माओवादी शिविरों में छापों के दौरान आरटीआई से संबंधित कागजात मिलते रहे हैं. इसके अलावा कई माओवादी समर्थकों के कब्जे से भी ऐसे कागजात बरामद हो चुके हैं. यह सिलसिला तेज होने के बाद पुलिस और खुफिया एजंसियों को माओवादियों के हाथों इस कानून के दुरुपयोग का पता चला. वनन बताते हैं कि माओवादी ठेकेदारों से परियोजना के मुनाफे में से 10 से 30 फीसदी तक हिस्सा मांगते हैं. माओवाद प्रभावित लातेहार जिले के पुलिस अधीक्षक माइकल एस.राज कहते हैं, "माओवादी पहले भी ठेकेदारों की हैसियत का विभिन्न स्त्रोतों से पता लगाते थे, लेकिन आरटीआई कानून ने उनकी राह आसान कर दी है. अब एक याचिका भेजते ही उनको तीस दिनों के भीतर तमाम सूचनाएं मिल जाती हैं."

आरटीआई से सूचना मिलने के बाद माओवादियों का वसूली दस्ता संबंधित ठेकेदार से संपर्क करता है और आरटीआई से मिली जानकारी उसके सामने रखते हुए मुनाफे में से हिस्सा मांगता है. संबंधित ठेकेदार इससे इनकार भी नहीं कर सकता क्योंकि इसकी सजा होती है मौत. दुमका में एक ठेकेदार ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, "आरटीआई के बल पर माओवादियों ने जीना मुश्किल कर दिया है. अब हमारे सामने दो ही विकल्प हैं. या तो उनके कहे मुताबिक रकम दें या फिर जान गंवाएं." पिछले महीने गुमला में जब कुछ ठेकेदार ने माओवादियों को मांगी गई रकम का भुगतान करने से इंकार कर दिया तो उनके सिर धड़ से अलग कर दिए गए.

क्या है तरीका

देश के विभिन्न राज्यों में माओवादी अब इस कानून का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं. झारखंड में किसी सीधे-सादे गांव वाले के नाम-पते से आरटीआई याचिकाएं दायर कर माओवादी सरकारी ठेकों की परियोजना लागत और उसमें शामिल ठेकेदारों की संपत्ति का पता लगा रहे हैं ताकि उनसे मोटी रकम की वसूली की जा सके. रांची जोन के आईजी एम.एस.भाटिया कहते हैं, खूंटी वाले मामले में माओवादियों ने अपने किसी सफेदपोश समर्थक की आड़ में आरटीआई याचिका दायर की थी. पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. फिलहाल इस याचिका को दायर करने वाले की तलाश की जा रही है. हाल में खासकर ग्रामीण इलाकों से आरटीआई याचिकाओं की तादाद बढ़ने की पुष्टि सूचना आयुक्त के कार्यालय ने भी की है. झारखंड के मुख्य सूचना आयुक्त डी.के.सिन्हा कहते हैं, ग्रामीण इलाकों से मिलने वाली आरटीआई याचिकाओं में आवेदक यही जानना चाहते हैं कि सरकारी निविदाएं किसको आवंटित की गई हैं और परियोजना की कुल लागत कितनी है. वह कहते हैं कि मौजूद कानून के तहत यह सूचनाएं मुहैया कराना सरकार की मजबूरी है.

ऐसा अकेले झारखंड में ही नहीं हो रहा है, बल्कि पड़ोसी, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश से भी इसी तरह की सूचनाएं मिल रही हैं. इन राज्यों के तमाम माओवादी एक मजबूत नेटवर्क से आपस में जुड़े हैं. इन संगठनों की अलग-अलग शाखाओं के बीच आरटीआई से मिली सूचनाओं के लेन देन के भी कई मामले सामने आए हैं.

सूचना का अधिकार कानून

भारत सरकार ने किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण के काम में पारदर्शिता और जबावदेही को बढ़ाने के लिए वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया था. संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा है. अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति का अधिकार है. इस कानून के तहत आम व्यक्ति किसी भी कार्यालय से किसी भी तरह की सूचना हासिल कर सकता है, लेकिन इसमें देश की सुरक्षा से संबंधित जानकारी नहीं मांगी जा सकती.

कोई भी नागरिक निर्धारित फीस के साथ हिंदी या अंग्रेजी में लिखित रूप से आवेदन करके सूचना पाने के लिए अनुरोध कर सकता है. सभी प्रशासनिक कार्यालयों में केंद्रीय जन सूचना अधिकारी के पास जनता को आवश्यक सूचना प्रदान करने की व्यवस्था करने का अधिकार है. इसके लिए संबंधित अधिकारी को तीस दिन के अंदर पूछी गई जानकारी का जवाब मुहैया कराना जरूरी है. ऐसा नहीं करने की स्थिति में उसे सजा हो सकती है.

अंकुश के उपाय

झारखंड के एक सामाजिक कार्यकर्ता विश्वेशर महतो कहते हैं, ‘आरटीआई का यह दुरुपयोग चिंताजनक है.' वह कहते हैं कि इस कानून में सूचनाएं मुहैया कराने से पहले आवेदक की पृष्ठभूमि की जांच की व्यवस्था का प्रावधान भी होना चाहिए. कोलकाता के आरटीआई कार्यकर्ता सोमेश्वर बर्मनराय कहते हैं, "माओवादी आरटीआई कानून के सरल प्रावधानों का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं. इस पर अंकुश लगाने के लिए इस कानून में संशोधन जरूरी है."

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः एन रंजन

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