सूखा महाराष्ट्र, अक्षम सरकार | दुनिया | DW | 07.03.2013
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दुनिया

सूखा महाराष्ट्र, अक्षम सरकार

पश्चिम भारत में लाखों लोग पानी के अभाव से पीड़ित हैं. एक तरफ बढ़ती जनसंख्या और शहरों का फैलाव इसके कारण हैं, लेकिन प्रशासन में कमियां भी सूखे के लिए जिम्मेदार ठहराई जा रही हैं.

मध्य महाराष्ट्र में पानी का अभाव इतना ज्यादा हो गया है कि 1972 में सूखा भी इसके आगे फीका पड़ रहा है. मुख्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कहते हैं कि लिखित इतिहास में पहले कभी भी महाराष्ट्र के जलाशयों में इतना कम पानी नहीं था. चव्हाण पिछले दो सालों से मॉनसून को दोष देते हैं लेकिन आलोचकों का कहना है कि सरकार की नीतियों ने पानी के अभाव को खत्म करने के लिए कुछ खास नहीं किया है. मॉनसून जून के महीने में महाराष्ट्र पहुंचता है और अब गाय भेड़ों को बचाने और मध्य महाराष्ट्र में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए 2000 टैंकरों का बंदोबस्त किया गया है.

चव्हाण के मुताबिक, "हर एक दिन के साथ टैंकरों को और लंबे रास्ते तय करने पड़ते हैं. यह एक बड़ी समस्या है." मुख्यमंत्री के दफ्तर से यह पता नहीं चल पाया है कि सूखे से ग्रस्त 10,000 गांवों में कितने लोग रहते हैं लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि लाखों लोग पानी के अभाव से परेशान हैं.

जालना जिले में अस्पताल चला रहे क्रिस्टोफर मोसेस कहते हैं इलाके में कंपनियां बंद हो गईं और किसान के फसल सूखने लगे. "यह सूखा है. गांववालों के पास खाने को कुछ नहीं है, वे अपने बर्तनों को खरोंचकर खाना खाते हैं...पानी से संबंधित बीमारियां फैल रही हैं, अब भुखमरी और कुपोषण से भी लोग पीड़ित होंगे. " मोसेस के मुताबिक पानी की समस्या की वजह से उन्हें अपने अस्पताल के कुछ हिस्सों को बंद करना पड़ेगा. अस्पताल के 117 साल पुराने इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है. सरकार की तरफ से पानी का बंदोबस्त- इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली है.

भारत में अब भी दो तिहाई जनसंख्या खेती बाड़ी और पशु पालन से आजीविका चलाती है. सालाना मॉनसून इनके लिए जीवनरेखा के समान है क्योंकि भारत में दो तिहाई जमीन बारिश के पानी से सींची जाती है. 1972 में सूखे से देश भर में खाद्यान्न की कमी हुई और सारे खाद्य उत्पादों के दाम बढ़े. भारत सरकार को फिर आयात बढ़ाने पड़े. कुछ ऐसी हालत 2009 में भी हुई.

चव्हाण ने कहा है कि अगर इस साल भी बारिश में कमी हुई तो हालत और खराब हो जाएगी. लेकिन सूखे को बढ़ावा देने का आरोप कुछ हद तक प्रशासन पर भी लग रहा है. आलोचकों का कहना है कि नेताओं और अधिकारियों ने जल परियोजनाओं में पैसे तो लगाए, लेकिन इन्हें पूरा नहीं किया. कई प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार की वजह से पूरे नहीं हो पाए. 2000 से लेकर 2010 में सरकार ने कई अरब डॉलर जल सुरक्षा पर खर्च किए लेकिन सींची गई जमीन के उत्पादन में केवल 0.1 प्रतिशत से बढ़त हुई. महाराष्ट्र में काम कर रहे अर्थशास्त्री प्रोफेसर एचएम दसर्दा कहते हैं कि भ्रष्टाचार का सूखे में बड़ा योगदान है और बारिश के पानी को बचाकर रखने में भी लोगों की समझ कम है. उनका कहना है कि उपयोगी जल प्रशासन के लिए बड़े प्रोजेक्टों और डाम बनाने से हटकर समुदायों को अपने स्तर पर पानी बचाने की रणनीति बनानी होगी. देसर्दा कहते हैं कि जमीन के नीचे पानी निकालने पर भी कड़ा नियंत्रण करना होगा. लेकिन दसर्दा के मुताबिक "सूखा बारिश की कमी की वजह से नहीं, सरकारी नीतियों में कमी की वजह से है."

एमजी/एएम (एएफपी)

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