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दुनिया

सुरक्षा परिषद पर चीन का साथ चाहेगा भारत

अमेरिका और फ्रांस जैसे बड़े देशों का समर्थन हासिल करने के बाद भारत की कोशिश रहेगी कि यूएन चीन भी भारत की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य की दावेदारी में सहयोग करे. चीन वीटो शक्ति वाले पांच देशों में शामिल है.

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हाल के दिनों में भारत ने इन पांच देशों के साथ शामिल होने की कसरत तेज कर दी है और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब भारत पहुंचे तो उन्होंने इसका खुला समर्थन किया. अब प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के भारत दौरे में दिल्ली की कोशिश होगी कि चीन इसमें कोई अडंगा न लगाए.

पाकिस्तान के साथ चीन की नजदीकियों से ऐसी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं कि बीजिंग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की पक्की दावेदारी का विरोध कर सकता है. और ऐसे में दिल्ली का रास्ता मुश्किल हो जाएगा. भारत जर्मनी सहित पांच देश अगले महीने से दो साल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य बन रहे हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि इस दौरान लंबे वक्त से अटके पड़े संयुक्त राष्ट्र सुधारों को पूरा किया जा सकता है.

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1962 में युद्ध के मैदान पर भिड़े पड़ोसी भारत और चीन के फिलहाल अच्छे व्यापारिक संबंध हैं और वैश्विक व्यापार और जलवायु परिवर्तन शिखर वार्ता में पश्चिमी देशों के दबाव के विरोध में दोनों एक साथ खड़े हुए.

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच फिलहाल व्यापार 60 अरब डॉलर का है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध सबसे अहम हैं. दोनों ही पक्ष इसे और बढ़ाना चाहते हैं और नई कोशिशें इस दिशा में जारी हैं."

दोनों ही देश कहते आ रहे हैं कि वह आपस में मुक्त व्यापार समझौता करना चाहते हैं लेकिन अभी तक इस पर ज्यादा प्रगति नहीं हुई है. दिल्ली को हमेशा यह आशंका रही है कि चीन अपने सस्ते उत्पाद भारत को बेच देना चाहता है. हालांकि दुनिया में दोनों देशों को उभरती हुई विश्व शक्तियों के तौर पर देखा जाता है, चीन का सकल घरेलू उत्पाद भारत से चार गुना ज्यादा है और वहां की मूलभूत संरचनाएं भारत के खस्ताहाल सड़कों और हवाई अड्डों की तुलना में काफी चमकदार है. गांवों की स्थिति दोनों देशों में एक जैसी है.

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