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ब्लॉग

सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी

भारत के प्रवेशद्वार कहे जाने वाले असम में बोड़ो उग्रवादियों ने दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इनमें से ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे. साफ है कि आतंकवादियों का न तो कोई मजहब होता है और न ही कोई जाति.

इतने बड़े पैमाने पर हुआ हमला राज्य की खुफिया एजेंसियों की नाकामी का ज्वलंत सबूत है. लेकिन एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं कि आखिर असम में उग्रवाद कब तक सिर उठाए खड़ा रहेगा? एक के बाद एक आने वाली सरकारें इस समस्या के समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठातीं? पिछले कोई 14 वर्षों से सत्ता संभाल रही तरुण गोगोई की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने इस समस्या की उपेक्षा क्यों की? हर बार की तरह इस हमले के बाद भी सरकारी तंत्र सक्रिय हो गया है. लेकिन कुछ दिनों बाद फिर सब कुछ यथावत हो जाता है.

उग्रवाद की जड़ें

असम में उग्रवाद की समस्या कोई नई नहीं है. यह राज्य आजादी के बाद से ही उग्रवाद झेल रहा है. पड़ोसी बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ के सवाल पर ही यहां अल्फा (यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट आफ असम) जैसे संगठन का जन्म हुआ था. इलाके के सात राज्यों में कोई भी राज्य इस समस्या से अछूता नहीं रहा है. इन तमाम राज्यों के लोगों की समस्या की मूल वजह यह है कि यह लोग आजादी के इतने सालों बाद भी खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते.

पहले इन इलाकों में राजाओं या कबीलों का शासन था. अब भी इन लोगों को लगता है कि भारत में उनका विलय जबरन किया गया है. अल्फा की तर्ज पर बोड़ो संगठन भी लंबे समय से अलग बोड़ोलैंड की मांग में हिंसक आंदोलन कर रहे हैं. हालांकि कुछ साल पहले राजनीतिक संगठन बोड़ो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ एक तितरफा समझौते के तहत स्वायत्त बोड़ो परिषद का गठन कर दिया गया था.

समस्या

सरकार ने उग्रवादी संगठन एनडीएफबी के साथ शांति प्रक्रिया भी शुरू की थी लेकिन एक मजबूत गुट इस बातचीत का विरोधी है. वह आतंक फैलाने के लिए मासूमों की जान ले रहा है. पिछले साल उसने इलाके में रहने वाले मुस्लिम लोगों पर हमले कर सौ से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी थी. अब सरकार ने कोई एक महीने पहले इन उग्रवादियों के खिलाफ साझा अभियान शुरू किया था. इसके तहत कई उग्रवादी नेता या मारे गए या फिर गिरफ्तार कर लिए गए थे. ताजा हमला उसी का बदला लेने के लिए किया गया है.

सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की पक्की सूचना थी. लेकिन उसने महज मुस्लिम बस्तियों में सुरक्षा मुहैया कराई. सरकार को गच्चा देते हुए उग्रवादियों ने अबकी वहां हमले किए जहां सुरक्षा लगभग नहीं के बराबर थी. बंगाल से सटे निचले असम के ज्यादातर इलाकों में घना जंगल है और इसकी सीमा पड़ोसी भूटान से मिलती है. उग्रवादियों को सहूलियत है कि वे बड़ा हमला करने के बाद सीमा पार कर भूटान में चले जाते हैं. कुछ साल पहले भूटान सरकार की सहायता से सीमावर्ती इलाकों में उग्रवादियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था. लेकिन उसमें खास कामयाबी नहीं मिली थी.

इसकी एक प्रमुख वजह यह थी कि सुरक्षा बलों को भूटान सरकार और सेना से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. वैसे भी इलाके की भौगोलिक स्थिति से बेहतर परिचित होने के कारण जंगल के भीतर होने के बावजूद सुरक्षा एजेंसियों को उनके ठिकानों की भनक नहीं मिलती. ताजा मामले में भी ऐसा ही हुआ है. हमलों के बाद पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद सरकार को अब तक एक भी हमलावर का सुराग नहीं मिल सका है.

समाधान

राज्य में एनडीएफबी और अल्फा के साथ बातचीत की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी है. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह समस्या कैसे हल होगी और क्या तमाम पक्ष इसके समाधान के प्रति सचमुच गंभीर हैं ? गुवाहाटी के पत्रकार एस.के.बरगोहांई कहते हैं, ‘कोई भी सरकार या राजनीतिक दल इस समस्या के समाधान के प्रति गंभीर नहीं हैं. इसलिए तमाम पक्षों को बातचीत की मेज पर ले आए बिना हड़बड़ी में आधी-अधूरी तैयारी के साथ शांति प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है और उसका नतीजा सामने है.'

मणिपुर में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एम. चोइबा सिंह कहते हैं, ‘सरकारों को इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा. लेकिन फिलहाल कहीं ऐसा नहीं लगता कि कोई भी राजनीतिक दल या सरकार इस समस्या को हमेशा के लिए खत्म करने के प्रति कृतसंकल्प है.' चुनावों के दौरान वादे तो सभी करते हैं, लेकिन सत्ता पाते ही उग्रवाद उनकी प्राथमिकता सूची में हाशिए पर चला जाता है. यानी निकट भविष्य में इस समस्या पर अंकुश लगने के आसार कम ही हैं.

ब्लॉग: प्रभाकर

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