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दुनिया

सुप्रीम कोर्ट ने नकारा जजों की नियुक्ति में सरकार का रोल

भारत सरकार को झटका देने वाले एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को नकार दिया है. 2014 के एनजेएसी एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए दो दशक पुराने कॉलेजियम सिस्टम को बरकरार रखने की सिफारिश.

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट (एनजेएसी) को असंवैधानिक बताया है. उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति के दो दशक पुराने कॉलेजियम सिस्टम की जगह 2014 में संविधान में 99वां संशोधन करके एनजेएसी एक्ट को लाया गया था.

कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के अलावा चार वरिष्ठ जजों का पैनल होता था जो चीफ जस्टिस, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की सिफारिशें करता था. कॉलेजियम की सिफारिशें फिर मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजी जाती थी. जिसकी सहमति के बाद अंतिम फैसला लागू होता है. एनजेएसी एक्ट के समर्थन में कई लोगों की दलील रही है कि इस तरह जजों द्वारा जजों की नियुक्ति का तरीका लोकतांत्रिक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मोदी की एनडीए सरकार के लिए झटका माना जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय कानून मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने हैरानी जताते हुए कहा, "लोगों की इच्छा को कोर्ट में ले जाया गया था. एनजेएसी को राज्यसभा और लोकसभा का पूरा समर्थन प्राप्त था." बंगलूरू में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गौड़ा ने कहा कि इस फैसले पर अगला कदम वरिष्ठ सहयोगियों और प्रधानमंत्री से विमर्श के बाद ही तय होगा.

एनजेएसी एक्ट पर सर्वसम्मत फैसला लेने वाली पांच-जजों की संवैधानिक बेंच में जस्टिस जेएस खेहर, जे चेलामेश्वर, एमबी लोकुर, कुरियन जोसेफ और एके गोयल शामिल हैं. 99वें संशोधन को असंवैधानिक मानने के मुद्दे पर जस्टिस चेलामेश्वर ने बाकी चार जजों से अलग उसे वैध बताया. बेंच ने कॉलेजियम सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए सुझाव मंगवाए हैं और 3 नवंबर के लिए अगली सुनवाई तय की है.

आरआर/एमजे (पीटीआई)

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