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ब्लॉग

सुप्रीम कोर्ट का फैसला, राजनीतिज्ञों पर भी लागू होगा कानून

चारा घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लालू यादव और अन्य अभियुक्तों पर हर केस में अलग मुकदमा चलेगा. कुलदीप कुमार का कहना है कि फैसले से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट देश में कानून का राज लाने के लिए प्रतिबद्ध है.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को दो दिनों के भीतर दो झटके झेलने पड़े हैं. दो दिन पहले एक नए टीवी चैनल रिपब्लिक ने उनके और माफिया सरगना शहाबुद्दीन के बीच कथित तौर पर एक साल पहले टेलीफोन पर हुई बातचीत की एक रिकॉर्डिंग प्रसारित की थी जिसमें शहाबुद्दीन को कई तरह की मांगें करते हुए सुना जा सकता है. हालांकि इस रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता की अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे लालू यादव दबाव में तो आ ही गए क्योंकि उनकी छवि बहुत अरसे से शहाबुद्दीन के राजनीतिक आका की रही है. शहाबुद्दीन उनकी पार्टी के सांसद भी रहे हैं और कई वर्षों से जेल में हैं.

इस विवाद को तो लालू यादव मुस्कुरा कर झेल भी जाते लेकिन आज सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जो झटका दिया है, वह बहुत गंभीर है. चारा घोटाले में चले तीन मामलों में से एक में लालू यादव को दोषी पाया गया और उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक भी लगी हुई है. हालांकि उन्हें जेल की सजा हुई है लेकिन वह जमानत पर छूटे हुए हैं. अन्य दो मामलों में झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी यह दलील मान कर उन्हें मुक्त कर दिया था कि एक ही मामले में किसी पर दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. इस दलील को आज सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है और अब सीबीआई की विशेष अदालत नौ माह के भीतर इस मामले की सुनवाई पूरी करके इसका निपटारा करेगी.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को तेज करने और कानून का राज स्थापित करने की दिशा में बढ़ाया गया एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है और इस बात को एक बार फिर सिद्ध करता है कि संविधान के आधार पर चलने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तर्क का सहारा नहीं लिया जा सकता कि जनता की अदालत सर्वोपरि है और यदि जनता ने हमें चुना है तो इसका अर्थ यह है कि हम पाक-साफ हैं. जहां तक जनता का सवाल है, तो पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता ने लालू यादव को सबसे अधिक समर्थन दिया और जिन नीतीश कुमार के नेतृत्व में गठबंधन ने चुनाव लड़ा, उनकी पार्टी को लालू यादव की पार्टी से कम सीटें मिलीं. लेकिन इस जनसमर्थन का यह अर्थ नहीं कि इससे लालू यादव के सभी स्याह-सफ़ेद कारनामों पर स्वीकृति की मुहर लग गई. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून सभी पर लागू होगा.

यह फैसला सिर्फ लालू यादव के लिए परेशानी का बायस नहीं है क्योंकि भारतीय राजनीति में केवल वही भ्रष्ट नेता नहीं हैं. इन दिनों ईमानदार नेता चिराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलते. मुलायम सिंह यादव का परिवार हो या मायावती की बहुजन समाज पार्टी, डीएमके हो या एआईडीएमके, अकाली पार्टी हो या कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी---सभी में भ्रष्ट नेता भरे पड़े हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन सबके लिए खतरे की घंटी है. उन्हें सांत्वना सिर्फ इस बात की है कि न्याय प्रक्रिया बेहद लंबी है और हर मामला सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंचता. लेकिन यह भी सही है कि जो पहुंच जाता है उस पर अक्सर सही फैसला लिया जाता है.

मसलन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे भाजपा नेताओं पर बाबरी मस्जिद ध्वंस कांड में आपराधिक मुकदमा चलाया जाए और तय किया जाए कि मस्जिद तोड़ने की साजिश में ये और अन्य नामित लोग शामिल थे या नहीं. इसके पहले लालू यादव की तरह ही ये नेता भी नितांत तकनीकी आधार पर मामले से अलग कर दिये गए थे. यानी आज के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर भारतवासियों और राजनीतिक नेताओं को यह घोर-गंभीर गर्जना सुना दी है कि न्याय के मंदिर में देर है, अंधेर नहीं. यूं भ्रष्टाचार में लिप्त राजनीतिक नेता कानून को अपने ठेंगे पर रखने के अभ्यस्त हो चले हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला उनकी नींद उड़ाने के लिए काफी है.

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