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दुनिया

सुधारों के बेअसर होने का खतरा

यूरोप में राज्य और धर्म के बीच कोई संबंध न होने को धर्मनिरपेक्षता माना जाता है, वहीं बहुलतावादी भारत में इसका अर्थ यह है कि राज्य किसी धर्मविशेष के प्रति पक्षपात न करे और सभी धर्मों से एक जैसा बर्ताव करे.

भारतीय संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों में सभी नागरिकों के लिए एक समान संहिता बनाने की बात भी कही गई है लेकिन क्योंकि संविधान की धारा 25 में सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करें और उसे प्रचारित-प्रसारित करने की आजादी दी गई है, इसलिए धर्मनिरपेक्षता का भारतीय संस्करण काफी जटिल और अस्पष्ट है. अक्सर देखा जाता है कि चुनाव लड़कर सत्ता में आने वाली पार्टियां वोटों की खातिर धार्मिक कट्टरता से प्रति वैसा कठोर रुख नहीं अपना पातीं जैसा उन्हें अपनाना चाहिए. नतीजतन न केवल लोगों का धर्मनिरपेक्षता पर से विश्वास उठने लगता है, बल्कि समाज में उसकी जड़ें भी काफी कमजोर पड़ने लगती हैं. आश्चर्य नहीं कि पिछले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट तक तो यह कहना पड़ा कि अभी तक तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन वह कब तक ऐसा रह पाएगा, कहना मुश्किल है.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट एक ऐसी याचिका पर विचार कर रहा है जिसमें मांग की गई है कि ईसाइयों के धार्मिक कानूनों को भारतीय दंड संहिता और आपराधिक प्रक्रिया संहिता जैसे नागरिक कानूनों पर वरीयता दी जाए और चर्च द्वारा स्थापित धार्मिक अदालतों के निर्णय को वैध माना जाए. दरअसल समस्या यह है कि रोमन कैथॉलिक चर्च ने अनेक ईसाइयों की दोबारा शादी को मान्यता दे रखी है जबकि सरकारी कर्मचारी पहली पत्नी के होते हुए दूसरी शादी नहीं कर सकता. याचिका में यह मांग भी की गई है कि तलाक के बारे में भी इन धार्मिक अदालतों के निर्णय को वैध माना जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट का विचार है कि इस तरह के मामले राज्य द्वारा स्थापित अदालतों में राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों के तहत तय होने चाहिए और किसी भी धार्मिक समुदाय के पर्सनल लॉं यानि वैयक्तिक कानून को इन मामलों से दूर रहना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट का कहना धर्मनिरपेक्षता की धारणा के पूरी तरह अनुकूल है लेकिन समस्या यह है कि आजादी के बाद से अब तक विभिन्न केंद्र सरकारों ने जिस तरह का आचरण किया है, उसके मद्देनजर इस धारणा को मानने वालों की तादाद लगातार कम होती जा रही है. जब 1985 में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला विवादों के घेरे में आया था, तब तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम सांप्रदायिक नेतृत्व को संतुष्ट करने के लिए साल भर बाद कानून में बदलाव कर दिया था. यह केस तलाकशुदा मुस्लिम महिला को पूर्व पति द्वारा गुजारे के लिए मामूली से रकम खर्चे के तौर पर दिये जाने के बारे में था. कांग्रेस के भीतर और बाहर के कट्टरतावादी तत्वों ने इस फैसले को इस्लामी शरीयत के खिलाफ करार दिया और इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ दिया. राजीव गांधी सरकार द्वारा कानून के बदले जाने से जहां मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों का हौसला बढ़ा, वहीं हिन्दू सांप्रदायिकतावादियों को यह प्रचार करने का मौका मिल गया कि सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर चल रही है. भारतीय जनता पार्टी को इसी समय जनसमर्थन मिलना शुरू हुआ.

तुर्की, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, इराक, ईरान, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे अनेक मुस्लिम देशों में एक साथ तीन बार तलाक-तलाक-तलाक बोलकर दिया गया तलाक वैध नहीं माना जाता, लेकिन भारत में इसे कानूनन वैध माना जाता है. मुस्लिम समुदाय के बीच असगर अली इंजीनियर जैसे कई समाज सुधारकों और महिला संगठनों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ. इसलिए ईसाई भी यह मांग कर रहे हैं कि उनके धार्मिक कानूनों को वैधता प्रदान की जाए. हिन्दू सांप्रदायिक तत्व इस मुद्दे पर लंबे समय से प्रचार करते रहे हैं कि सरकार धर्मनिरपेक्षता के नाम पर केवल हिन्दुओं के धार्मिक रीतिरिवाजों और कानूनों में बदलाव करती है और अन्य धर्मों के साथ पक्षपात करती है. यह सच है कि समान नागरिक संहिता बनाने की ओर अभी तक किसी भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है. ऐसे में भारत के धर्मनिरपेक्ष बने रहने के बारे में सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज है क्योंकि धार्मिक आजादी की आड़ में सभी धर्मों के पुरातनपंथी और कट्टरपंथी तत्व उन सभी मध्ययुगीन मूल्यों को लाद देना चाहते हैं जिनके खिलाफ उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के समाज सुधारकों ने आंदोलन चलाये थे और कुछ हद तक सफलता भी प्राप्त की थी.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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