1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

सीपीएम की खिसकती जमीन बचाने की कवायद

जब से सीपीएम बंगाल में हारी है उसका राष्ट्रीय महत्व तो गिरा ही है, बंगाल में भी उसका समर्थन लगातार गिर रहा है. हाशिए पर जाने और समर्थकों को खोने से बचने के लिए चार दशक में पहली बार सीपीएम बंगाल में महाधिवेशन कर रही है.

‘तृणमूल कांग्रेस हटाओ, बंगाल बचाओ' और ‘भाजपा हटाओ, देश बचाओ' के नारे के साथ अपने पैरों तले की खिसकती जमीन को बचाने के लिए सीपीएम कोई चार दशक बाद कोलकाता में अपना महाधिवेशन (प्लेनम) आयोजित कर रही है. 27 से 31 दिसंबर तक होने वाली इस बैठक में पार्टी की भावी रणनीति तय करने के अलावा सांगठनिक कमजोरियों को दूर करने पर भी गहन विचार-विमर्श होगा. इसमें 436 प्रतिनिधि भाग लेंगे. पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी के नेतृत्व में पार्टी का यह पहला महाधिवेशन होगा. यहां पिछला महाधिवेशन 1979 में हुआ था. सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथी दल 27 दिसम्बर को ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड मैदान से तृणमूल-मुक्त बंगाल का नारा बुलंद करेंगे. अगले साल लेफ्ट फ्रंट के मजबूत गढ़ रहे बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस महाधिवेशन की अहमियत काफी बढ़ गई है.

भावी दशा-दिशा

सीपीएम का यह महाधिवेशन आने वाले दिनों में पार्टी की दशा-दिशा तो तय करेगा ही, वाम राजनीति को प्रासंगिक बनाए रखने के उपायों पर भी विचार करेगा. इससे पहले वर्ष 1979 में हावड़ा के सलकिया में पार्टी के पिछले महाधिवेशन का आयोजन किया गया था. इतने लंबे अरसे बाद दोबारा यहां इसके आयोजन से साफ है कि सीपीएम पहचान के गहरे संकट के दौर से गुजर रही है और भावी रणनीति तय करने के मामले में वह अब भी अंधेरे में भटक रही है. पार्टी का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अब भी प्रकाश कारत के नेतृत्व की छाया से मुक्त नहीं हो सकी है. विशाखापत्तनम में आयोजित 21वीं पार्टी कांग्रेस में नए महासचिव सीताराम येचुरी ने कई नई नीतियों और कार्यक्रमों का एलान किया था. उनको काफी सराहना भी मिली थी. लेकिन अबतक उन नीतियों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है.

बीते कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में लेफ्ट फ्रंट लगातार हाशिए पर बना हुआ है और उसकी चुनावी जमीन भी पैरों तले खिसक रही है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में लेफ्ट फ्रंट के तमाम घटकों ने महज 12 सीटें जीती थी और उसे 4.8 फीसदी वोट मिले थे जबकि वर्ष 1989 में उन्होंने 10.6 फीसदी वोट हासिल किए थे. 2004 के लोकसभा चुनावों में उसे 62 सीटें मिली थीं. सबसे अहम बात यह है कि बिहार, आंध्र प्रदेश व पंजाब जैसे राज्यों में उसका कोई नामलेवा तक नहीं बचा है.

पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल के अलावा दूसरे राज्यों में पार्टी के चुनावी प्रदर्शन में लगातार गिरावट आई है. कभी अपने सबसे मजबूत गढ़ रहे बंगाल में भी पार्टी खस्ताहाली के दौर से गुजर रही है. यहां उसका वोट बैंक लगातार बिखर रहा है. अब हालत यह है कि बंगाल में भी उसकी वापसी बेहद मुश्किल नजर आ रही है. इसी वजह से तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में भी लेफ्ट फ्रंट को पीछे धकेल दिया है.

आंदोलन की रणनीति

सीपीएम ने बंगाल में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन की रणनीति बनाई है. पार्टी के प्रदेश सचिव व विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र आरोप लगाते हैं, "तृणमूल कांग्रेस के शासन में बंगाल में अप्रत्याशित रूप से अराजकता और भ्रष्टाचार फैला है. अगले विधानसभा चुनाव में तृणमूल को सत्ता से हटाने के लिए सीपीएम आखिरी दम तक आंदोलन करेगी." मिश्र का आरोप है कि सीपीएम समेत पूरे लेफ्ट का आंदोलन राज्य के ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित होगा. राज्य में अराजकता, भ्रष्टाचार, लोकतंत्र पर हमले और महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं.

सीपीएम धीरे-धीरे राजनीति में अप्रासंगिक हो रही है. लेकिन आखिर इसकी वजह क्या है? राजनीतिक विश्लेषक जीवेश मंडल कहते हैं, "केंद्रीय नेतृत्व के तानाशाही रवैए, गलत नीतियों, बड़े पैमाने पर गुटबाजी, प्रदेश सीपीएम में नेतृत्व का अभाव, भ्रष्टाचार और युवा तबके का मोहभंग ही इसके प्रमुख कारण हैं." लोकसभा में सीपीएम के नेता पी. करुणाकरण को भी समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर उनकी पार्टी लगातार कमजोर होती कांग्रेस की जगह क्यों नहीं ले पा रही है या फिर केंद्र में भाजपा और राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक दल उसे अप्रासंगिकता की ओर कैसे धकेल रहे हैं. वह पार्टी के विभिन्न संगठनों की सदस्य संख्या में लगातार आ रही गिरावट से भी चिंतित हैं. करुणाकरण के बयान से साफ है कि पार्टी के ज्यादातर नेता अब तक भटकाव के शिकार हैं. राजनीतिक हाशिए पर पहुंच चुकी पार्टी के नेताओं को अंधेरे से बाहर निकलने का कोई ठोस रास्ता नहीं सूझ रहा है. ऐसे में यह महाधिवेशन दम तोड़ती पार्टी में एक नई जान फूंक सकता है.

DW.COM

संबंधित सामग्री