सिल्क रूट प्रोजेक्ट पर संदेह की हवा | दुनिया | DW | 16.05.2017
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दुनिया

सिल्क रूट प्रोजेक्ट पर संदेह की हवा

चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने बीजिंग में सिल्क रोड सम्मेलन के बाद कहा कि इस मेगा प्रोजेक्ट पर व्यापक सहमति है. जर्मनी के एशिया विशेषज्ञ जिगफ्रीड ओ. वोल्फ ने डॉयचे वेले से बातचीत में इस पर संदेह व्यक्त किया है.

डॉयचे वेले: क्या बीजिंग के वन बेल्ट वन रोड सम्मेलन को सफल कहा जा सकता है?

जिगफ्रीड ओ वोल्फ: एक तो यह कहा जाना चाहिए कि जो देश चीनी जानकारी के अनुसार वन बेल्ट वन रूट (ओबोर) पहलकदमी से जुड़े हैं, उनके आधे से भी कम ने अपना प्रतिनिधिमंडल बीजिंग भेजा. दूसरी ओर बहुत से देश जो प्रोजेक्ट की कामयाबी के लिए महत्वपूर्ण हैं, जैसे कि भारत, वे अभी भी भागीदारी के बारे में निश्चित नहीं हैं. अमेरिका ने डॉनल्ड ट्रंप के पूर्व एशिया सलाहकार मैट पोटिंगर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा है तो यूरोपीय संघ की ओर से उपाध्यक्ष जिर्की कातेनेन ने यूरोपीय संघ का पक्ष रखा.

कुल मिलाकर सम्मेलन में बहुत से भागीदारों की शंकाओं और चिंताओं को दूर नहीं किया जा सका. इसमें प्रोजेक्ट के सिलसिले में चीन का द्विपक्षीय रवैया और पारदर्शिता की कमी तथा भ्रष्टाचार शामिल है. खासकर बाजार में न्यायोचित शर्तों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और आपसी आर्थिक आदान प्रदान पर यूरोप की मांगों पर चीन ने कोई जवाब नहीं दिया.

यह भी पढ़ें: क्या भारत सिल्क रूट प्रोजेक्ट में शामिल न हो कर गलती कर रहा है?

क्या नया सिल्क रूट या ओबोर सचमुच शामिल देशों के लिए सौभाग्य है जैसा कि चीन दावा कर रहा है?

ओबोर सिर्फ भावी पीढ़ियों पर ही आर्थिक बोझ नहीं डाल रहा है बल्कि शामिल देशों के लिए गंभीर सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक समस्याएं भी खड़ी कर रहा है. जैसे कि ओबोर का एक प्रमुख प्रोजेक्ट चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर पाकिस्तान के लिए कई समस्याएं दिखा रहा है. उसके प्रांतों को फैसले की प्रक्रिया से अलग रखा जा रहा है, स्थानीय संसाधनों का बिना किसी हर्जाने के दोहन हो रहा है, जमीन का अधिग्रहण हो रहा है, इलाके के लोगों का विस्थापन हो रहा है और प्रतिस्पर्धा से खिलवाड़ हो रहा है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि चीन स्थानीय विवादों और भूराजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की ताकत को कम आंक रहा है.

मजेदार बात यह है कि बहुत से प्रोजेक्ट जो अब ओबोर का हिस्सा बनाये गये हैं वे पहले उसका हिस्सा ही नहीं थे बल्किन बहुत पहले ही उनकी योजना बनाई गई थी. अब नये सिल्क रूट का प्रचार करने के लिए सभी पुराने और नये विकास प्रोजेक्टों को उसमें शामिल कर दिया गया है.

Siegfried Wolf Südasienexperte Uni Heidelberg (Siegfried Wolf)

एशिया विशेषज्ञ जिगफ्रीड वोल्फ

यूरोपीय संघ की ओर से ओबोर को लेकर मुख्य चिंताएं क्या हैं?

पहली तो यह कि अब तक ओबोर में कोई संस्थागत संरचना नहीं है. दूसरे यह कि चीन परियोजनाओं का फैसला द्विपक्षीय तौर पर करने को प्राथमिकता दे रहा है, जिस पर सम्मेलन के दौरान जोर भी दिया गया. इसके विपरीत यूरोपीय संध बहुपक्षीय संवाद का पक्षधर है.  फैसले की प्रक्रिया बहुत कम पारदर्शी है और फैसला लेने वाले लोगों की तरफ से ओबोर के बारे में पर्याप्त सूचना भी नहीं दी जाती. ईयू और चीन के बीच संवाद का कोई मंच नहीं है. तभी संभव होगा कि ईयू के भागीदार समानता के आधार पर टेंडर की प्रक्रिया में चीनी प्रतिद्वंद्वियों के साथ हिस्सा ले सकें. जब तक चीन बहुपक्षीय रवैया नहीं अपनाता और अपने को कानून सम्मत राज्य, मानवाधिकार और लोकतंत्र जैसे मूल्यों के लिए नहीं खोलता ओबोर को लेकर शंकाएं बनी रहेंगी.

इस विशाल संरचना और निवेश प्रोजेक्ट के पीछे क्या चीन की सत्ता की लालसा है?

चीन पिछले दशकों की अपनी आर्थिक सफलता को भूराजनैतिक फलक पर ले जाना चाहता है. वह नये रणनैतिक पार्टनर जीतना चाहता है और बहुध्रुवीय विश्व बनाना चाहता है, जो चीन के राष्ट्रीय हितों के लिए लाभदायक हैं. इस पहलकदमी के लिए आर्थिक और राजनैतिक निर्भरताएं बनाई जा रही हैं. चीन ओबोर परियोजना के लिए मुख्य रूप से मदद कर्ज के रूप मे देगा. उसकी वजह से कमजोर अर्थव्यवस्थाएं कर्ज के बोझ में दब जायेंगी जिसके गंभीर नतीजे होंगे.

चीनी योजनाओं को अमेरिका किस तरह देख रहा है?

ट्रंप सरकार ने अब तक ओबोर पर अपनी नीति तय नहीं की है. लेकिन वाशिंगटन के नजरिये से हितों का टकराव हो सकता है. अमेरिका विरोधी रुख वाले देश जैसे कि ईरान और रूस चीन की पहलकदमी से ताकत महसूस कर सकते हैं.पाकिस्तान जैसे देश भी जो इलाके में अमेरिका के प्रभाव में कमी चाहते हैं. साथ ही चीन इलाके में अपनी सुरक्षा गतिविधियां बढ़ा रहा है, वह रूस द्वारा शुरू की गई अफगानिस्तान वार्ता में हिस्सा ले रहा है.

साथ ही अमेरिका ओबोर को एशिया प्रशांत क्षेत्र में भी अपने हितों के लिए खतरा समझता है. वैसे ओबोर अमेरिका के लिए आर्थिक तौर पर कोई खतरा नहीं है, खासकर यूरोप के साथ उसके कारोबारी रिश्ते जो दशकों पुराने आर्थिक और राजनैतिक समानता पर आधारित हैं.

इंटरव्यू: शामिल शम्स

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