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दुनिया

सिर पर छत नहीं तो क्या हाथ में वोट तो है

जर्मनी के बेघर लोगों के लिए खाना और शाम को सिर छिपाने की कोई जगह ढूंढना हर रोज की मुसीबत है. इसके बाद भी लोग तमाम बाधाओं को पार कर वोट डालने की तैयारियों में जुटे हैं, चुनाव इसी महीने 24 तारीख को होंगे.

बर्लिन में बेघर लोगों के केंद्र "वारमर ऑटो" में गर्मियों की इस दुपहरी में दो दर्जन से ज्यादा लोग बैठकर चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे हैं या फिर डाइस खेल रहे हैं. स्पागेटी बोलोन्या (एक इतालवी व्यंजन) की खुशबू इस कमरे में चारों तरफ फैली है. बहुत कम फर्नीचर वाला ये कमरा कभी एक पब हुआ करता था. बोडो बुर्गर बताते हैं, "यह इस हफ्ते का मुख्य भोजन है." किसी किसी दिन यहां सूप भी परोसा जाता है. जर्मन राजधानी में यह जगह किस्मत वाले लोगों को मिलती है. यह केंद्र बेघर लोगों को बाल धोने की जगह, कपड़ा धोने, इंटरनेट, सोशल वर्करों से मुलाकात, आराम करने की जगह जैसी बुनियादी सुविधायें मुहैया कराता है. लोग यहां आराम करते हुए राजनीति की भी चर्चा खूब करते हैं. 54 साल के बुर्गर दोपहर का भोजन करने के बाद कॉफी पीते हुए अखबार पढ़ रहे हैं. वे चांसलर अंगेला चांसलर के बारे में अच्छी राय नहीं रखते. वो कहते हैं, "अंगेला मैर्केल केवल अव्यवस्था फैला रही हैं."

बुर्गर को पूरा यकीन है कि शरणार्थियों की जिस भीड़ को मैर्केल ने 2015 में देश में आने दिया वही यहां अपराध बढ़ने के लिये जिम्मेदार हैं. इतना ही नहीं मकान का किराया काफी बढ़ गया है और ड्रग्स के कारोबारी खूब मुनाफा कमा रहे हैं. बुर्गर कहते हैं, "यह एकदम तय है कि मैं 24 सितंबर को वोट देने जा रहा हूं. मैं उनके चुनाव कार्यक्रम देख रहा हूं. आंतरिक सुरक्षा मेरे लिये सबसे पहले जरूरी है."

ज्यादातर लोगों को चुनाव से जुड़े उनके दस्तावेज डाक से भेजे जायेंगे. यह उन बेघर लोगों के लिये एक बड़ी समस्या है जिन्होंने अब तक अपना नाम मतदाता सूची में नहीं डलवाया है और जिनके पास स्थायी पता नहीं है. हालांकि इसके बाद भी ये लोग चुनाव देने के अधिकारी हैं बशर्ते कि वो जरूरी शर्तें पूरी करते हों. बर्लिन के चुनाव अधिकारी डीटर साराइथर ने कहा, "3 सितंबर तक उन्हें मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना होगा." यह काम निर्वाचन कार्यालय के दफ्तर या फिर स्थानीय प्रशासन के उस केंद्र में होगा जहां ये लोग ज्यादातर वक्त बिताते हैं. इसके बाद वो पोलिंग स्टेशन पर जा कर वोट डाल सकते हैं. लोकतांत्रिक देश में वोट देने का अधिकार सभी नागरिकों को है.

ऐसे देश में जहां हर चीज का लेखा जोखा रखा जाता है वहां फिलहाल कितने लोग अस्थायी घरों या फिर सड़कों पर रह रहे हैं इसके बारे में कोई आंकड़ा नहीं है. गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक यह संख्या 2014 में 3 लाख 35 हजार थी जो 2018 तक बढ़ कर 5 लाख 36 हजार होने की आशंका है. केवल बर्लिन में ही 5 से 8 हजार बेघर लोगों के रहने की बात कही जाती है. यह वो लोग हैं जो खुले में, पुलों के नीचे और लावारिस घरों में पड़े हैं. इसके साथ 20 हजार वैसे लोग भी हैं जिनके पास अपना मकान तो नहीं लेकिन उनके सिर पर कम से कम छत तो है. वार्मर ऑटो दोनों तरह के लोगों के लिये स्वर्ग जैसा है. बहुत से लोग हैं जिनकी बेहतर जिंदगी का सपना टूट गया और वो बर्लिन में फंस कर रह गये.

सामाजिक कार्यकर्ता कार्स्टेन क्रुल कहते हैं, "हमारे कई मेहमानों के लिए मतदान उतना जरूरी नहीं होता लेकिन हम उन्हें वोट दने के लिए प्रेरित करते हैं." इन लोगों की बात भी सुनी जानी चाहिए.

ऐसे हालात के बाद भी बहुत से बेघर लोग अपना वोट देने जरूर जाते है, या शायद अपनी इस हालात के कारण ही.

चार साल पहले के चुनाव में 122 बेघर लोगों ने संघीय चुनाव में वोट डाला था. बर्लिन में कई ऐसे कार्यक्रम किये गये जिससे कि राजनीतिक प्रतिनिधियों और इन बेघर लोगों का संपर्क जोड़ा जा सके. इन कार्यक्रमों में राजनेता बेघर लोगों से छोटे छोटे गुटों में बात कर उनकी मुश्किलों को जानने और समझने की कोशिश करते हैं. इसका मकसद होता है इनकी जरूरतों के बारे में पता लगाना. इसी तरह के कार्यक्रम की आयोजक किर्स्टीन वुल्फ कहती हैं, "बेघर लोगों के लिए यह जरूरी है कि उन्हें महसूस हो कि उन्हें सुना जा रहा है." बहुत से लोग जो राजनीति के खिलाफ हो गये हैं वो नाराज, निराश और दुखी हैं.

61 साल के हंस गियॉर्ग शॉटेनहाम्ल इन लोगों में शामिल हैं. वो कहते हैं, "मैं क्यों वोट देने के लिए परेशान रहूं? कोई हम जैसे लोगों की चिंता नहीं करता." एक और जर्मन बेघर ने खाने की कतार में खड़े कई विदेशी लोगों की तरफ ध्यान दिलाया. लोगों को खाना या फिर रात में कहीं टिकने की जगह के लिेए बहुत परेशानी हो रही है क्योंकि पूर्वी यूरोप से बहुत सारे लोग जर्मनी आ रहे हैं. वो कहते हैं, "ये लोग पूर्वी यूरोप से यहां चले आते हैं जैसे यह दूध और शहद का देश हो."

यहां मौजूद एक और शख्स ने कहा, "लोग हमारे साथ कुछ नहीं करना चाहते." हालांकि इन लोगों ने चुनाव के दिन अपनी आवाज सुनाने का इरादा छोड़ा नहीं हैं, वह कहते हैं, "मेरा बैलट पेपर ही मेरा कलाशनिकोव है."

एनआर/एमजे (डीपीए)

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