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दुनिया

"सिर्फ पैसे नहीं, समाज बदलो"

एशियाई विकास बैंक का कहना है कि सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक विकास से ही अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है. दुनिया की 60 फीसदी आबादी वाला एशिया विश्व के सिर्फ 30 फीसदी कारोबार में शामिल है.

एशियाई बैंक के प्रमुख रजत नाग ने डॉयचे वेले के साथ खास बातचीत में अपनी राय साझा की. उनका कहना है कि भारत और चीन भले ही विश्व विकास के इंजन बन गए हों लेकिन सिर्फ यही दोनों देश पूरी दुनिया का आर्थिक बोझ नहीं उठा सकते. एशियाई विकास बैंक 1966 से टिकाऊ विकास और गरीबी कम करने पर काम कर रहा है. पेश है रजत नाग से बातचीत के कुछ अंश.

डीडब्ल्यूः टिकाऊ विकास एशिया के कई देशों के लिए चुनौती है. चीन में तेजी से विकास तो हो रहा है, लेकिन साथ ही पर्यावरण खासा बीमार हो चुका है. डर है कि आर्थिक विकास इसकी वजह से फीकी पड़ जाएगी. इस संदर्भ में विकास और टिकाऊ विकास कैसे साथ हो सकते हैं?

रजत नागः मेरे हिसाब से यह बात समझना बहुत जरूरी है कि विकास का तभी कोई मतलब है यदि सभी लोगों को इसमें शामिल किया जाए. पूरे एशिया में असमानता बढ़ रही है. हमको इसके बारे में सोचना है कि वे लोग, जो सबसे निचले तबके के हैं, उनको कैसे विकास में शामिल ही नहीं किया जाए, बल्कि इस योग्य बनाया जाए कि उनका योगदान भी हो. इसके साथ कई शर्तें जुडी हैं.

वे लोग शिक्षित होने चाहिए, सेहतमंद होने चाहिए. बहुत जरूरी है कि महिलाओं को भी पूरी प्रक्रिया में शामिल किया जाए. कोई तुक नहीं बनता कि हम मजदूरों की आधी संभव संख्या को देश के विकास में शामिल न करें. साथ ही देश में सभी संस्थानों का ठीक से काम करना बहुत जरूरी है. सिर्फ एक ऐसे देश को विदेश से भी निवेश मिल सकते हैं जिसमें कानून का पालन हो रहा हो.

इसके अलावा एशिया को इस पर सोच विचार करना होगा कि भविष्य में ऊर्जा की बढ़ती मांग किस तरह पूरी की जाए. कैसे दोबारा इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा को इस्तेमाल किया जाए जैसे कि पवन या सौर ऊर्जा. हमें पर्यावरण की रक्षा करनी होगी. यह कहना कि 'हम विकास आज करेंगे और साफ सफाई बाद में' संभव नहीं है.

डीडब्ल्यूः आपने बढ़ती असमानता और अमीरों गरीबों के बीच बढ़ती खाई का जिक्र किया, जो एशिया के बहुत सारे देशों के लिए बड़ा बोझ है. भारत का हमेशा नाम इस मामले में लिया जाता है. इस चुनौती का हल ढूंढने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

रजत नागः जब सभी लोगों को विकास में शामिल करना है और खाई को कम करना है, तब उसके तीन स्तंभ हैं. पहला, तो विकास ही है और वह तभी संभव है जब निवेश करने के लिए वातावरण ठीक हो और आधारभूत ढांचा भी हो. मैं मानता हूं कि दूसरा स्तंभ उन अवसरों को आजमाने की संभावना है, जिनसे विकास हो सकता है.

भारत में कुशल आईटी विशेषज्ञों की कोई समस्या नहीं. लेकिन उन लोगों का क्या किया जाए जिनके पास डिग्री तक नहीं है. शिक्षा इसलिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. लेकिन सिर्फ स्कूली शिक्षा नहीं, कारखानों और फैक्ट्रियों में भी प्रशिक्षण की बेहतर व्यवस्था की जरूरत है. तीसरा स्तंभ मेरे विचार से समाजिक सुरक्षा है. क्योंकि सभी प्रयासों के बावजूद कुछ लोग हमेशा तंत्र के बाहर रहेंगे. इन लोगों को सरकारी मदद मिलनी चाहिए, पेंशन या दूसरी तरह सहायता.

Rajat Nag im Gespräch mit Priya Esselborn

प्रिया एसेलबॉर्न की रजत नाग के साथ बातचीत

भारत सरकार ने इस मामले में बहुत काम किया है. ग्रामीण इलाकों में लोगों को साल में कुछ महीने नौकरी दिलाने के कार्यक्रम काफी सफल रहे हैं. साथ ही सभी लोगों को पासपोर्ट दिलाने का काम भी अच्छा है क्योंकि उसके जरिए सहायता और पैसा उन लोगों तक सीधा पहुंच सकता है, जिनको इसकी जरूरत है. इस सबसे व्यवस्था में कमियों को कम किया जा सकता है. भ्रष्टाचार एशिया के बहुत सारे देशों में आर्थिक और समाजिक, दोनों तरह की समस्या है. सिर्फ कानून बनाने से नहीं, बल्कि उन्हें लागू करना भी जरूरी है.

डीडब्ल्यूः शिक्षा जरूर भविष्य को बेहतर बनाने के लिए अहम है. लेकिन यदि हम एशिया को देखें, तो दो अलग दृश्य हैं. एक कि कुछ समाज ऐसे हैं जिसमें आबादी बुजुर्ग है या हो रही है, उदाहरण के तौर पर चीन और जापान. दूसरी तरफ ऐसे देश, जिनकी आबादी कम उम्र की है, जैसे भारत. इसके साथ किस तरह की चुनौतियां जुड़ी हैं?

रजत नागः अगर आप एशिया को अपनी संपूर्णता में देखें तब समझ में आता है कि एशिया एक बहुत ही युवा महाद्वीप है, यानी आबादी युवा है. उदाहरण के तौर पर भारत की आबादी की औसतन आयु 25 साल के आस पास है. जापान और दक्षिण कोरीया बुजुर्ग समाज हैं. चीन में आबादी अब बूढ़ी होनी लगी है. लेकिन इसका असर कुछ ही सालों में पूरी तरह से देखने को मिलेगा.

इसका मतलब कि हमको भारत जैसे देश में सुनिश्चित करना होगा कि युवा आबादी के साथ जुड़ा फायदा अभिशाप न बन जाए. अगर युवाओं को अच्छी शिक्षा न मिले, तो ऐसा हो सकता है. संख्या बड़ी नहीं, बल्कि गुणवत्ता ज्यादा होनी चाहिए. मेरे कहने का मतलब है कि अगर लाखों इंजीनियर तैयार किए जा रहे हैं और वे बाजार की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, तो इसका कोई फायदा नहीं. जिन देशों में आबादी बूढ़ी हो रही है, उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि कुशल कामगारों को कैसे लाया जाए.

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